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समुद्र के आँसू

samudr ke ansu

एक दिन मैंने

पूछा समुद्र से

देखा होगा तूने, बहुत कुछ

आर्य, अरब, अँग्रेज़ों का

उत्थान-पतन

सिकंदर की महानता

मौर्यों का शौर्य, रोम का गौरव

गए सब मिट, तू रहा शांत

अब, इस तरह क्यों घबराने लगा है

अमेरिका, रूस के नाम से पसीना

क्योंकि बार-बार आने लगा है

मुक्ति सूनी होगी तूने, व्यक्ति की

बुद्ध, ईसा, रामकृष्ण‍

सब हुए मुक्त

देखो तो आदमी पहुँचा कहाँ

वह ढूँढ़ चुका है, युक्ति

मानवता की मुक्ति का

अरे, रे तुम तो घबरा गए

एक बार, इस धरा-धाम की भी

मुक्ति देख लो

अच्छा तुम भी मुक्त हो जाओगे

विराट शून्य की सत्ता से

एकाकार हो जाओगे

लो, तुम भी बच्चों-सा रोने लगे

मैंने समझा था, केवल आदमी रोता है

तुम भी, अपना आपा इस तरह खोने!

स्रोत :
  • रचनाकार : कुमार मुकुल
  • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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