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समय का प्रश्न

samay ka parashn

शिवम् अवस्थी

शिवम् अवस्थी

समय का प्रश्न

शिवम् अवस्थी

और अधिकशिवम् अवस्थी

    आज जो मुट्ठी में है पल, कल रेत-सा फिसल जाएगा,

    ये मुक़द्दर का सितारा, कल दिशा बदल जाएगा।

    हम खड़े हैं उस दोराहे, जहाँ मंज़िल खो चुकी है,

    बंद आँखों की पलक पर, बेबसी-सी सो चुकी है।

    रात के गहरे तिमिर में, सुबह शायद सो गई हो!

    कौन जाने कल समय की, चाल कैसी हो गई हो?

    ज़िंदगी है या कि केवल, प्रश्न बनकर रह गई हो?

    जिन हवाओं ने हमारे, कान में वादे बुने थे,

    और हमने जो मुहब्बत, के हँसी-किस्से सुने थे।

    आज उन यादों की ख़ुशबू, आँसुओं में घुल गई है,

    साँस की डोरी अचानक, आँधियों में खुल गई है।

    याद की वो नाव शायद, भँवरों में ही खो गई हो!

    कौन जाने कल समय की, चाल कैसी हो गई हो?

    ज़िंदगी है या कि केवल, प्रश्न बनकर रह गई हो?

    जिन उम्मीदों के सहारे, उम्र का दरिया किया पार,

    क्या मिला इस ज़िंदगी में, क्या रही है जीत या हार।

    ढूँढते हैं हम जिन्हें अब, वो सितारे बुझ चुके हैं,

    हसरतों के जाल में हम, किस क़दर अब उलझ चुके हैं।

    शूल की इस सेज पर अब, नींद अपनी रो गई हो!

    कौन जाने कल समय की, चाल कैसी हो गई हो?

    ज़िंदगी है या कि केवल, प्रश्न बनकर रह गई हो?

    राख को मुट्ठी में लेकर, आग को हम ढूँढते हैं,

    फासलों के शहर में हम, पास को हम ढूँढते हैं।

    टूटती-सी साँस को अब, कौन-सी मंज़िल मिलेगी,

    क्या पता इस पतझड़ों में, कौन-सी कलियाँ खिलेंगी।

    अश्क की इस धार में ही, हर हँसी क्या धो गई हो!

    कौन जाने कल समय की, चाल कैसी हो गई हो?

    ज़िंदगी है या कि केवल, प्रश्न बनकर रह गई हो?

    स्रोत :
    • रचनाकार : शिवम् अवस्थी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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