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सहनशीलता के क्षितिज

sahanshilata ke kshitij

जनमेजय

जनमेजय

सहनशीलता के क्षितिज

जनमेजय

और अधिकजनमेजय

    और अब तुम किसी साँझ के

    आर-पार गुजर जाओ जहाँ

    मनुष्यों और वृक्षों के बावजूद

    आवाज़ें और हवाएँ एक-दूसरे का

    अकेलापन थामती हैं:

    बातों और रहस्यों के

    अंतहीन टुकड़ों के सहारे।

    ऐसी अनेकों साँझों के अधूरे, अलक्षित विचार

    क्षितिजों पर इकठ्ठा होने लगते हैं;

    क्षितिज जैसे—

    मनुष्यत्व और देवत्व के क्षितिज

    रंगों और कूँचियों के क्षितिज

    सपनों और यथार्थो के क्षितिज

    प्रेम और समझौतों के क्षितिज

    बस्तियों और खँडहरों के क्षितिज

    मकानों और घरों के क्षितिज।

    और ये क्षितिज ही बन जाते है

    हमारे अस्तित्व में सहनशीलता के अंतिम बिंदु।

    इसके बाद प्रश्नों और निरुत्तरता के

    क्षितिज पर जीने के लिए मजबूर

    हम दिन और रात होते हैं।

    स्रोत :
    • रचनाकार : जनमेजय
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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