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एक

हम चलते हैं अलग-बगल

साथ-साथ

ठीक वैसे ही

जैसे चलती है बाईं सड़क

दाईं सड़क के साथ।

दो

सड़कें सोचती कि

काश! हम भी नदी होते

हम पर से पुल निकलते

दो किनारे जुड़ते

पुल तो सड़क के ऊपर भी निकलते हैं

पर इनका दुर्भाग्य कि

इनके बीच निकले तो

केवल और केवल डिवाइडर।

तीन

बरसात ने उधेड़ कर रख दी

इनकी देह,

सड़कें भी शिकार हो गई

सियासत की।

चार

अलग-अलग दिशा से बहकर

आती काली नदियों का संगम है

दोराहे, तिराहे या चौराहे

इसी संगम पर हर दिन लगता है

ट्रैफ़िक का महाकुंभ।

पाँच

सड़कों ने अपने घुटने मोड़े हैं

भीतर की ओर

तब पैर पसार कर सोया है फुटपाथ

फुटपाथ के प्रति सड़क का

समर्पण प्रशासन की किताब में अतिक्रमण है।

छह

फुटपाथ चल रहा है

सड़क के साथ

जैसे शहर की भीड़ में

चल रही हो माँ

थामकर बच्चे का हाथ

सात

गाँव का जयकिशन

शहर में जैकी हो गया

गाँव की पगडँडी

शहर में पहुँचते-पहुँचते

फुटपाथ हो गई।

आठ

शहर में नहीं मिली

जिनको कहीं भी पनाह

फुटपाथ ने की है व्यवस्था

उनके गुज़र-बसर की

फुटपाथ पर इंसान ही नहीं चलते,

फुटपाथ से कईयों के जीवन भी चलते हैं।

स्रोत :
  • रचनाकार : कुलदीप सिंह भाटी
  • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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