लेट जाइए महासागर की
मेंड़ पर
बंद कर लीजिए आँखें
और जब कि झुलाए आपको बड़ी-सी भ्रष्ट लहर
वह अहंकारी वह संभावित हत्यारी थल की
आप खोजिए
तारे को
जो
आपके
मस्तक में
चमक रहा
लेटे रहिए शांत
बिना आतंक
पा गए हैं आप उस तारे को!
और जब कि आपको लहर उठाए-पटके, पटके-उठाए
आपको क्यों चिंता हो कि यह महासागर है जिसके बीच आप
लेटे हैं
आपको क्यों चिंता हो कि इसका असंयमित विस्तार है
आप तो अपने तारे से जो आपके भेजे के अंदर घुमड़ रहा है
निरापदता पा लेते हैं
शार्क जो बेसब्री से कूद रही है पड़ोसी
नरभक्षी लहर पर आपको नहीं खा सकती
आपके तारे पर उसके दाँत टूट जाएँगे
न यह काफ़ी बर्फ़ीला पानी ही आपको परेशान करेगा
आपका विस्फोटक तारा आपको गरमी दे रहा है
वह आपका छोटा-सा निर्भयी असीम तारा
जो महज़ इसलिए छोटा है
क्योंकि गहरा है, गहरा-दूर, दूर-गहरा है
आपके मस्तक में
शांति से बनाए रखिए पानी संतुलन अपना
फ़र्क़ ही क्या है आप महासागर पर लेटे हैं
यह महासागर आप पर
वैसे भी तो अंत नहीं है आख़िर नहीं है
महासागर का
वैसे भी तो अंत नहीं है न आरंभ है
किसी का भी जिस में हरकत होती है
- पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 179)
- संपादक : श्यौराजसिंह जैन
- रचनाकार : अलोयज़ मायेतिच
- प्रकाशन : बाहरी पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
- संस्करण : 1978
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