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सभ्यताओं के बीच खड़ा मनुष्य

sabhytaon ke beech khaDa manushya

अंकित कुमार

अंकित कुमार

सभ्यताओं के बीच खड़ा मनुष्य

अंकित कुमार

और अधिकअंकित कुमार

    जब पहली बार नदियों ने अपने किनारों पर मिट्टी को घर बनने दिया,

    तब किसी नगर की नींव नहीं,

    मनुष्य के स्वप्न की नींव रखी गई थी

    उस समय Confucius दूर पूर्व में व्यवस्था और नैतिकता के धागों से

    समाज को सिलने का प्रयास कर रहा था,

    और यूनान में Socrates बाज़ारों के बीच खड़े लोगों से पूछ रहा था

    तुम जिस जीवन को जी रहे हो,

    क्या उसे सचमुच जानते भी हो?

    सभ्यता बढ़ती गईं दीवारें ऊँची हुईं,

    कानून लिखे गए, राजाओं के नाम पत्थरों पर उकेरे गए

    पर हर नए महल के साथ कुछ झोपड़ियाँ भी अँधेरी हुईं

    तब प्लेटो ने आदर्श राज्य की कल्पना की और अरस्तू ने मनुष्य को राजनीतिक प्राणी कहा,

    किन्तु इतिहास की धूल बताती है कि मनुष्य राजनीति से पहले दुख का प्राणी था

    समय आगे बढ़ा साम्राज्य बने धर्मों का विस्तार हुआ और समुद्रों पर झंडे लहराए गए

    और जब यूरोप की सड़कों पर आधुनिकता ने पहला क़दम रखा,

    Descartes ने घोषणा की मैं सोचता हूँ, इसलिए हूँ।

    लेकिन उसी क्षण कारखानों के धुएँ के बीच हज़ारों लोग शायद सोच रहे थे

    हम श्रम करते हैं, इसलिए कौन है?

    उनकी आवाज़ सुनकर मार्क्स ने इतिहास को वर्गों के संघर्ष में पढ़ा,

    और बताया कि सभ्यताओं की चमक अक्सर अदृश्य हाथों के पसीने से बनती है

    फिर भी सभ्यता का दुख केवल शोषण नहीं था

    वह अकेलापन भी था।

    भीड़ से भरे नगरों में मनुष्य स्वयं से दूर होता गया

    तब Nietzsche ने पुराने मूल्यों की क़ब्र पर खड़े होकर नए मनुष्य का स्वप्न देखा,

    और Heidegger ने पूछा क्या हमने पृथ्वी पर रहना सीखा,

    या केवल उस पर अधिकार करना?

    आज, जब उपग्रह आकाश में घूम रहे हैं

    और कृत्रिम बुद्धिमत्ता हमारे शब्दों को पढ़ रही है,

    मैं किसी खंडहर के पास खड़ा होकर सोचता हूँ

    सिंधु की सभ्यता, एथेंस की गलियाँ, रोम के स्तंभ,

    नोर्मंडी के साहिल सब एक ही प्रश्न पूछ रहे हैं

    क्या सभ्यता मनुष्य को अधिक मानवीय बनाती है,

    या केवल अधिक शक्तिशाली?

    और दूर कहीं समय मुस्कुराता है,

    क्योंकि हर सभ्यता अपने उत्तरों पर गर्व करती है,

    पर इतिहास उसे उसके अनुत्तरित प्रश्नों से याद रखता है

    शायद सभ्यताओं का अंतिम दुख यही है वे अमर होना चाहती हैं,

    पर अमर केवल उनके प्रश्न होते हैं।

    स्रोत :
    • रचनाकार : अंकित कुमार
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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