साँझ : एक दीठि
saanjh ha ek dithi
परदेश स' घूरल सुरुज जल्दी पहुँच' चाहै छल घर
रस्तेमे क्षयरोगक दौरा तेज भ' गेल रहै
शोणितक किछु कतरा बोकरि, सुरुज मरि गेल, बिसरा गेल
एहिना कएकटा दिन सुरुज नमैत ऐछ
आ कएकटा साँझ मरि जाइछ
चिड़ै-चुनमुनी गबैछ 'शोकगीत’
हतासिनी दिशा हिचुकि-हिचुकि
तोड़ि देलक पियरका लहठी
आ ओकर नोर
ओहि धारक कातक बालुमे विलीन भ' गेलै
ओना ई सभटा महज एकटा दिनचर्या बनि गेल छै
धारक लगीचक ओइ बस्तीमे
भूखें लोहछैत, अपन नेना के बौंसि रहल कोनो माय
जे ओकर बाबू पू-भर स' कमाक' औतै।
सभतरि पसरि गेल छै अन्हारक आतंक
मात्र ई उल्लूक हेंज प्रसन्नचित्त चिचिआएल फिरै-ए
—इजोत-इजोत-इजोत।
- पुस्तक : ऐ अकाबोन मे (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 14)
- रचनाकार : राज
- प्रकाशन : नवारम्भ, पटना
- संस्करण : 2011
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