Font by Mehr Nastaliq Web

रंगों के पार्श्व में

rangon ke paarshv mein

दीप्ति कुशवाह

दीप्ति कुशवाह

रंगों के पार्श्व में

दीप्ति कुशवाह

और अधिकदीप्ति कुशवाह

    (एक)

    अपनी तरह की एक ध्वनि

    बैंगनी गुलमोहर की पंखुड़ियाँ

    नहीं गिरतीं सीधे ज़मीन पर

    वे हवा में घूमती हुई

    किसी भूली हुई याद से टकरा जाती हैं

    यह रंग इंद्रधनुष से शुरू होकर

    ध्वनि में उतरता है

    और चुपचाप आत्मा में थरथराता है

    जिस उछाह में यह दृश्य लिपटा था

    ‘दीदी तेरा देवर दीवाना...’

    वह सिर्फ़ एक फ़िल्मी मुस्कान नहीं थी

    एक पूरी पीढ़ी की नमी थी

    बैंगनी रंग में डूबी हुई

    कहीं दूर

    ‘पर्पल-सी’ की लहरें

    दो स्त्रियों के मौन प्रेम की भाषा थीं

    जो तटों पर नहीं

    एक निषिद्ध स्पर्श में बहती रहीं

    जामुनिया अब स्फटिक नहीं

    एक अस्वीकार की स्मृति है

    जिसे वह स्त्री आँखों में सहेजे फिरती है

    जो सिर्फ़ सुनी जाती थी

    समझी नहीं गई

    और जिसने फिर भी

    अपने उत्तर ख़ुद गढ़ लिए

    रंगों की तरह।

    (दो):

    एक अकेली आभा

    जब कहीं 'हाथ पीले' करने कहे गए

    तो किसी किसान ने

    अपना खेत गिरवी रखा

    किसी माँ ने अपने जेवर

    स्वर्ण के स्वप्न में चुपचाप उगा रंग

    जो मन का छलावा भी है

    व्याधि का संकट भी

    यह रंग मंदिर में

    प्रतिमा के लिए आसन की तरह बिछा

    किसी मन्नत की तरह काँपता

    हल्दी की थाली में आशीर्वाद बना

    और प्रेम ने अपना प्रथम रंग

    पीला होना चुना

    हमारी ज़िंदगी से

    कहाँ चले गए वे लोग

    जो पोस्टकार्ड के पीलेपन पर

    लिख भेजते थे अपने खतरे और ख़ुशियाँ

    पीला वह बल्ब है

    जो अनाथालय की रातों में

    नींद की जगह जलता है

    थकी हुई छत से लिपटा हुआ

    यह वही रंग है

    जो बसंत में पराग बन उड़ता है

    सड़कों पर

    सावधानी की चेतावनी बन

    ठहर जाता है

    हर बार

    जब कोई ‘पीली छतरी वाली लड़की’

    बारिशों में निकलती है

    एक किताब अपने भीतर पढ़ती है

    पीले में पीले कई हैं

    हमेशा नत है अमलतास

    अपने भरेपूरेपन में भी

    जैसे भीतर कोई क्षमा माँगता हो

    कभी भय

    कभी कांति

    और काग़ज़ का वह टुकड़ा भी पीला

    जिस पर वसीयत नहीं

    बस एक गुहार लिखी गई थी।

    (तीन)

    प्रश्न में चमकता हुआ

    नीला एक नहीं है

    वह आकाश से शुरू नहीं होता

    न ही समुद्र में समाप्त

    वह एक स्क्रीन से झाँकता हुआ

    आँखों में जलन छोड़ जाता है

    ब्लू रे की किरच

    धूप में रंग नहीं,

    थकान भरती है

    एक नीली डायरी की याद

    मन में

    कोई पुरानी दोपहर लौटा देती है

    यह रंग

    पिकासो की उदासी में गहराता था

    और वैन गॉग की ‘स्टारी नाइट’ में

    लहरों की तरह बहता रहा

    कुछ ने इसे स्कूली वर्दी कहा

    कुछ ने प्रभु का रंग बताया

    जैसे एक ही रंग

    हर बार नई भावना पहन लेता है

    एक शंख पर जमे

    पुरातन समुद्र के सूखे नीलेपन में

    उस नीलम सी गहराई नहीं

    जो अँगुलि की जगह

    मन के किसी अंधे कोने में जड़ा रहा

    नीला खुला भी था

    पर बाँधा गया

    ध्वजों में, कविताओं में

    नीला ख़ामोश रहते हुए

    सबसे ऊँचा शोर बन सकता है

    क्या कोई शब्द है

    जो इस रंग के भीतर की प्यास को बुझा सके?

    (चार):

    एक धीमा उजाला

    कभी यह आँख के भीतर

    डुबकी लेती स्मृति है

    कभी दीवार पर छाया बनी

    चुपचाप बैठी पीठ

    एक पुराना स्वेटर है पति का

    अलमारी में टंगा अब भी

    जिसमें समय की धड़कन

    छाती के पास सुनाई देती है

    यह रंग कोयले की खदान से निकला

    रात के अँधेरे में रहस्य की तरह फैला

    और किसी पुराने घाव की तरह

    सूख गया

    एक काली पट्टी थी

    कभी वेदना की गवाही

    कभी असहमति की चुप घोषणा

    असल में वही थी

    हमारे चुप हो जाने की आख़िरी सीमा

    ‘काले मेघा पानी दे’

    रेणु के गाँवों में सुनी गई एक पुकार

    जिसे साहित्य ने नहीं

    धरती की प्यास ने रचा था

    वह क्षण

    जब ‘ब्लैक’ की रानी मुखर्जी ने

    अक्षरों से पहले

    अँधेरे को पढ़ा

    यह एक लकीर भी

    जिसके उस पार जाना था

    पर जाया नहीं गया

    एक पर्स था

    रेल में छूट गया

    उपहार की गाढ़ी स्मृति में

    इसी रंग ने स्लेट बनकर

    आखर के उजाले बाँटे

    स्याही बनकर

    शब्दों को सुबहें दीं।

    (पाँच)

    देखने से बाहर

    हरे को देखा जा सकता है

    पर छुआ नहीं जा सकता हमेशा

    एक पर्दा

    जिसके पीछे

    हम अपने सबसे अंतरंग सच को

    क्रोमा की तरह ग़ायब कर देते हैं

    असलियत को ओझल कर

    संभावनाओं की सीमा बढ़ा देता है

    यह रंग

    यह वही है

    जो बैनरों पर चमकता है

    पर खेत की मेड़ तक

    उसकी छाया नहीं पहुँचती

    जिसे झँडे पर रखकर

    हम उसे ज़मीन से काट चुके हैं

    इस रंग को कविता में बचाया जा रहा है

    शुष्क नारों में तपाया जा रहा है

    ‘हरी घास पर क्षण भर’ का आलिंगन था

    जिसमें पृथ्वी ने अपना स्पर्श दिया

    कभी उँगली में पहना गया पन्ना

    सच को बोलने की ताक़त देता है

    तो कभी किसी काग़ज़ के नीचे दबा मिला हरा

    जहाँ उसे नीयत के खिलाफ़

    रिश्वत की तरह रखा गया था

    मन की जमीन नम हो

    तो दूब की लुनाई में

    गहराता है हरा

    और सरहद पर खड़ी सतर्कता तक

    फैल जाता है

    यह रंग हर बार याद दिलाता है

    कि कुछ रंग

    बस रंग नहीं होते

    वे तय करते हैं कि हम

    किस ओर देखते हैं

    किसे ओझल करते हैं।

    (छह)

    बीच का ताप

    नारंगी में लाल पूरा नहीं है

    पीला भी अधूरा

    पर दोनों की दहक

    इसमें अधिकार की तरह थिरकती है

    यह चटख है पताकाओं में

    मद्धम संध्या के विस्तार में

    इस रंग को

    केवल दीप्ति की तरह फैलना आता है

    यह मौन में सुलगती एक दीर्घ पुकार है

    बहुरंगी छवियों में

    लाल जब विद्रोह का चेहरा गढ़ रहा था

    भगवे ने समर्पण की आँखें दीं

    एक जला अन्याय पर

    दूजा ठहर गया जब साधना हुई

    दोनों जड़े हैं एक ही देह में

    एक ने लड़ना सिखाया

    दूसरे ने तपना

    पारिजात की सफ़ेद देह

    एक नारंगी तंतु से बँधी हुई

    जो भूमि तक पहुँचने से पहले

    गंध में ठहर जाती है

    जो संतरों की सुगंध है

    और कभी-कभी

    जलती चिट्ठी का काग़ज़

    कहीं जब एक बेटा

    पिता को खो कर लौटता है

    उस पर सूरज की अंतिम किरण

    नारंगी ही पड़ती है।

    (सात)

    एक अनुपस्थिति की उपस्थिति

    सफेद अस्पताल की चादरों में नहीं

    वह उस साँस में है जो लौट न सकी

    यह रंग कभी अश्रुपूर्ण संधियों का

    धुँधलाता हुआ व्रत

    कभी शून्य का विस्तार

    सदियों को समेटता हुआ

    वह झूठ की सतह पर भी बिछ सकता है

    और सत्य की ऊँचाई पर भी टिक सकता है

    बिना कोई पक्ष लिए

    किसी ने झूठ को सफेद बनाया

    किसी ने नमक कहा

    दूध, गौरैया का अंडा या बर्फ़ की परत

    सफेद हर जगह है

    और फिर भी नहीं है

    वह वही सफ़ेद है

    जो चरखे के सूत में नहीं

    प्रतिरोध की लय में घूमता था

    वहाँ वस्त्र नहीं था, विचार था

    जिसे पहना नहीं

    जिया गया

    जब ‘उम्र बरस कर सुफैद हो’ जाती है

    समय रुई के फाहे सा उड़ता है

    थमता नहीं

    इस रंग ने ख़ुद को कभी नहीं सँवारा

    सबने उसे अपने अर्थ से भर दिया

    वह स्वीकार करता रहा

    रंगों को, ध्वनियों को, मौन को, चिरशांति को

    सफ़ेद दरअसल एक आरंभ भी है

    और समापन भी

    एक ऐसा कैनवास

    जिस पर समय

    अपनी सबसे धीमी लिपि में लिखता है।

    (आठ)

    एक अनकही तपिश

    लाल

    न तो युद्ध है, न प्रेम

    वह वह तपिश है

    जो धमनियों में बिना नाम के बहती है

    कभी रक्त की तरह

    कभी गुलाब की राजस सुगंध की तरह

    यह वह लोकधुन है जिसमें कोई ग्राम्या

    अपने प्रीतपल को

    कसीदे की तरह टाँकती है

    “अरे रामा बीरबहूटी चुन लाई रे सखी...”

    वह लाल किला है

    जिसकी दीवारों ने इतिहास को जिया

    यह रंग

    सभाओं के बीच उठे हाथों में

    सपनों की तरह रिसा

    जहाँ विचारों की रक्तवाहिनियाँ

    जनपथ बन कर उभरती हैं

    यह रंग उस माँग की सूक्ष्मरेखा में

    अदृश्य हो गया था

    जिसमें प्रेम तो अमर रहा

    पर प्रतीक छीन लिए रूढ़ियों ने

    लाल एक पान की हँसी में

    छूटे हुए वाक्य की तरह है

    या उस पत्र की लिखावट

    जिसमें शब्द कम

    शोक अधिक होता है

    नारे की गरज में यह है

    गालों पर उभरी शर्म में

    और विद्रोह के अनकहे स्वर में भी है

    ‘लाल टीन की छत’ पर

    यह साँझ के अकेलेपन सा उतरता है

    जहाँ स्मृति की गिरहें

    खुलती हैं धीरे-धीरे

    और भीतर चुपचाप कुछ भीगता है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : दीप्ति कुशवाह
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY