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रमणीय चट्टी

ramniy chatti

हिमांशु विश्वकर्मा

हिमांशु विश्वकर्मा

रमणीय चट्टी

हिमांशु विश्वकर्मा

और अधिकहिमांशु विश्वकर्मा

    तथाकथित रमणीय चट्टी में

    बसा था एक ग्राम

    जहाँ के

    दैवीय नदी तटों पर

    घुला करती थीं शामें,

    प्रेम और विश्राम!

    पंडों-पूँजीपतियों के अधिकार से पहले

    वहाँ बसा करते थे लोग!

    लोकजीवन था।

    बसावट थी

    रहवास था।

    हम जब भी मिला करते

    जलती धुनी के समीप

    होती थी

    क़िस्सागोई!

    कमरू के लड़के ने निकाल ली थी भल

    फ़ौज की दौड़!

    पर बेटी घस्यारिन है अभी भी

    पार्ट-टाइम स्कूल जाती है अभी भी।

    इस छुट्टी गाँव से लौटकर जग्गू

    काट ले आया था

    रामबाढ़ा की दुकान के लिए

    चीड़ का चॉपिंग बोर्ड!

    बड़ा बेटा

    सूबेदार केशव दा का

    तो जर्मनी में शैफ़ लग गया,

    छोटा वाला केदार घाटी में

    खोल बैठा है होटल और कैंपिंग साइट

    परंतु करता है ठेकेदारी

    आजकल

    उसकी ईजा ढूँढ़ रही है ब्वारी।

    और

    बग़ल के ग्राम प्रधान की ईजा

    नसों के दर्द से

    अब खड़ी नहीं हो पाती

    उनके चेहरे पर उसके साथ बैठती हैं

    सैकड़ों मक्खियाँ!

    तथाकथित रमणीय चट्टी में

    बसा है एक ग्राम

    जहाँ अब दैवीय नदी तटों पर

    धुलती हैं हर वक़्त

    सहस्र धार्मिकों की असंख्य पीड़ाएँ,

    ढेरों वस्त्र, निर्वस्त्र लोग और टनों मल।

    आँखें देखती हैं

    अजीब तरह के अव्यवस्थित दृश्य

    यहाँ आकर नहीं करता कोई,

    ऐसी कल्पना

    ठीक तीन साल पहले नहीं थी

    यह दुनिया यहाँ।

    अब!

    ख़ूब मच्छीबाज़ारी है

    मैली-कुचैली गलियाँ हैं

    साथ ख़ूब-मक्खीमलि दुकानें।

    ख़ूब-खच्चर,

    ख़ूब रोड किनारे ठेलों के साथ

    भरपूर दुर्गंध की घुसपैठ भी!

    यहाँ गर्म कुंड में सरकारें सेंकती हैं

    अनगिनत हाड़-मांस के पुतले,

    खुलेआम नग्न,

    बेतरतीब और बेहया होकर

    ठूँस रही हैं घाटी में असभ्य व्यवस्था

    लोकल चालाक है

    उन्होंने ठेके पर थमाए हैं

    रोज़गार के पिट्ठू

    प्रवासी बंधुओं के हाथ में

    हैली एक अलग तरह का विध्वंसी है

    हाय!

    कभी ख़त्म होने वाला शोर!

    घाटी के बच्चे

    नहीं पढ़ पाते हैं

    इस धूम में अपना भविष्य!

    इस ख़रीद-फ़रोख़्त में

    घाटियाँ हो गई हैं तंग और उद्वेलित

    पर लोग नहीं हैं अब भी चिंतित

    नहीं दिखाई देती उनको

    कूड़े और मल पड़ी

    खो रही हैं

    अपने उद्गम को ही

    तथाकथित दैवीय नदियाँ और पहाड़।

    हिमाल में अब बिक चुकी हर नदी,

    हर जंगल,

    हर तख़्त के साथ।

    धीमे-धीमे

    रहवास ख़त्म हो रहा है अब पहाड़ों से

    खो रहे हैं

    अब कंठों से रहस्यमय गीत!

    स्रोत :
    • रचनाकार : हिमांशु विश्वकर्मा
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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