Font by Mehr Nastaliq Web

प्रलय में लय

prlay mein lay

सुशील कुमार

सुशील कुमार

प्रलय में लय

सुशील कुमार

और अधिकसुशील कुमार

    राख़ हो जाएगी

    देह एक एक दिन

    ये सपने ये रंग

    ये दुकान ये मकान

    ये बनाए हुए भविष्य

    सब बिला जाएँगे

    जो बचा रहेगा अंत तक

    वह यह जीवन है

    कैक्टस की तरह इस धरती पर

    असंख्य आपदाओं के बीच

    क्या तुमको नहीं लगता कि

    प्रेम के कारण ही बचेगा

    जिसे बचना है यहाँ

    —यह आदमी होने की घड़ी है,

    जैसे गुरुत्वाकर्षण से बंधी

    संपूर्ण सृष्टि चल रही

    सारे उपग्रह-ग्रह शून्य में अटके पड़े हैं

    महाकाल के बीच

    अंनत काल से!

    मुझे लगता है,

    प्रेम ही तुम्हें प्रलय से लय में लाएगी

    क्या कर पाएगा विज्ञान

    एक अर्ध-जीवित वायरस से बचा पाया हमारी सभ्यता?

    उसकी कुलीनताएँ—

    मॉल फैशन कलाएँ बैरकें

    पार्किंग पार्लियामेंट मिसाइलें

    जेट प्लेन और हथियार सब

    कितने कामयाब हुए हमारे दुःख में?

    बड़े-बड़े शूरमा और बाहुबली ढेर हो गए

    एक साँस के क्षीण होने पर!

    तार पर बैठी चिड़ियों की तरह कतार में

    विमान पत्तन में विमान खड़े हैं।

    गति थम-सी गई है।

    उसके सारे किए-धरे पर पानी फेरता

    एक वायरस ने उसे बता दिया है कि

    वह आदिम से आदमी बना है,

    इसे याद रखे हरदम!

    फिर भी मैं कहता हूँ

    कोरोना कुछ नहीं है

    आदमी की परछाईं है बस

    जो उसका पीछा कर रही है!

    उसके साथ चल रही है!

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुशील कुमार
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY