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प्रलय-दूत

prlay doot

देवेंद्र 'देव'

देवेंद्र 'देव'

प्रलय-दूत

देवेंद्र 'देव'

और अधिकदेवेंद्र 'देव'

    घुट रहा हो,

    जब गला ही न्याय का—

    आदर्श,

    रख दो ताक पर—

    संघर्ष की बुनियाद पर—

    ख़ून दे आरम्भ कर दो

    फिर नए अध्याय का।

    जुल्म,

    और अन्याय के

    तूफ़ान का पथ मोड़ दूँगा।

    हथकड़ी, बेड़ियाँ,

    पाबंदियाँ

    झकझोर दूँगा।

    मैं,

    प्रलय का दूत बन आगे बढ़ा हूँ।

    सत्य लिखने में

    अगर रुक जाएगी,

    तो—

    मैं कलम को तोड़ दूँगा।

    सिंह,

    तुम गरजो—

    हिमालय थरथरा जाए

    लहू की बाढ़ आए

    हिंद में ज्वार आ जाए।

    मरण

    त्यौहार हो उन्माद का।

    जन्म-सिद्ध

    अधिकार हमारा,

    जेलों में दम तोड़ रहा है।

    जन से

    युग-युग का नाता—

    तंत्र,

    दमन से तोड़ रहा है।

    कैसे लिक्खूँ गीत

    अमन, ख़ुशहाली के साथी—

    समय-पृष्ठ पर

    ख़ूनी मानव

    काले धब्बे छोड़ रहा है।

    हम,

    बर्बर अन्याय—

    नहीं अब और सहेंगे।

    माँ की कोख लजाए,

    अब ये नहीं सहेंगे।

    जन्म भारत के लिए है,

    मृत्यु भी उसको लिखेंगे।

    है यही पैगाम

    राणा, शिवा, भगत और आज़ाद का।

    घुट रहा हो जब गला ही...।

    स्रोत :
    • पुस्तक : संधियाँ लेकर (पृष्ठ 82)
    • रचनाकार : देवेंद्र 'देव'
    • प्रकाशन : वाणी प्रकाशन
    • संस्करण : 1998

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