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प्रियतमा की दृष्टि में

priyatma ki drishti mein

तैबा हबीब

तैबा हबीब

प्रियतमा की दृष्टि में

तैबा हबीब

और अधिकतैबा हबीब

    पूजनीय बनने के लिए

    नहीं करने होते पूजनीय कर्म

    नहीं दबानी होती अपने अंदर की कई प्रतिमाएँ

    जिसके होने भर से बन जाते हो तुम कुछ और

    किसी के हृदय में तुम्हें बसना होता है

    करना होता है प्रेम,

    करनी होती है सबसे कठिन तपस्या

    बनना होता है, किसी के भीतर का मौसम

    स्त्री की आँखों में अधिक जन्म लेते है

    देवता

    सिद्धार्थ उस रात नहीं निकलते

    तब भी होते वो बुद्ध

    अपनी प्रियतमा की दृष्टि में

    तभी होते वो महात्मा

    अपने पुत्र की दृष्टि में

    तब भी होते वो कल्याणकारी

    अपनी प्रजा की दृष्टि में

    गांधी महात्मा बने

    कस्तूरबा ने दी उन्हें

    वो ज़िद, वो सहनशीलता, वो ज़मीन

    जिस पर खड़ा हुआ महात्मापन

    कस्तूरबा वो नींव थी

    जो दिखीं नहीं किसी को

    पर जिसके होने से

    एक मनुष्य

    महात्मा हो गया

    सत्यवान के अल्पायु जीवन को

    बनाया चिरायु

    सावित्री की दृष्टि ने देखा था

    उनमें देवत्य

    प्रेम की यही ताक़त है

    मृत्यु को भी

    लौटना पड़ा खली हाथ

    महात्मा बनने के लिए करना होता है प्रेम

    और हो जाते हो

    किसी की दृष्टि में

    मनुष्य से अधिक।

    स्रोत :
    • रचनाकार : तैबा हबीब
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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