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सिंहावलोकन

sinhavlokan

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

और अधिकचन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

    बीतल आध शताब्दी जहिया, देश भेल स्वाधीन,

    एतबहि दिनमे बिलटि गेल सब, जे किछु छल प्राचीन।

    गान्धीजीक सकल चिन्तन, सपने बनि कऽ रहि गेल,

    सब सुख-सुविधा सीमित एखनहुँ, किछुए लोकक लेल।

    गाम धसल पाताल, नगर उठि चूमि रहल आकाश,

    किछु घरमे पेपच पड़ैछ, बाँकीमे पड़य उपास।

    ग्रामवासिनी भारतमाता, बनलि 'इण्डिया' कानथि,

    कोटि-कोटि सन्तानक क्रन्दन, पथने कान अकानथि।

    खण्डित भेल देश पहिले दिन, आब समाजो टूटल,

    हाथ पसारि रहल छी, लेने टिनही बाटी फूटल।

    कृषि व्यवसाय मुख्य छल, पोषक छल कुटीर उद्योग,

    पँचबरखा भेल योजना, रहल किछु नीरोग।

    रहि सकलहुँ ने घरक, घाट धरि पहुँचल नहिए भेल,

    फकफक-फफफक दीपक जरइछ, बाती अछि बिनु तेल।

    भौतिकवादक चमक-दमकमे, आँखि तेना चोन्हरायल,

    पहिलुक अरजल गेल हाथसँ, हाथ किछुओ आयल।

    नैसर्गिक वन उजड़ल, जन्मल कंक्रीटक जंगल,

    पर्यावरण प्रदूषित चौदिस, पसरल गेल अमंगल।

    भूगर्भक संचित निधि सब, मङनीमे फुका रहल अछि,

    राष्ट्रक धन जेम्हरे जे पाबय, तेम्हरे नुका रहल अछि।

    कर्णधार जे बनला से, कुड़ियौलनि अपने पेट,

    जनताकेँ टल्हा, अपना सोना चौबीस करेट।

    सौँसे सदाचारकेँ टप-टप, कदाचार गिड़ि गेल,

    न्यायपालिकासँ विधायिका, अछि सोझे भिड़ गेल।

    साक्षर शब्द उनटलापर, सद्यः राक्षस बनि जाय,

    जे कहबय नेता जनताकेँ, सैह रहल भुतिआय।

    केवल मत मङबाक समयमे, आबथि बनि जन-सेवक

    जितलापर सर्वज्ञ कहाबथि, जनता कहबय बुड़बक।

    जन प्रतिनिधि अपनाकेँ मानथि, संविधानसँ ऊपर

    बैसथि गाछक फुनगीपर, मतदाता भूपर।

    तेँ मतदाता पतलो खड़रथु, फल सब हुनके हिस्सा,

    सगरो संसार घुमथु, जनताकेँ सुनबथु खिस्सा।

    रामराज्य शब्दक पाछाँमे, भेल 'ह'कारक योग,

    तेँ गणतन्त्रक जगह पकड़लक, 'गन’—तन्त्रक उद्योग।

    आन-आन सब देश अपन मिलिजुलि कयलक उत्थान,

    चौबटियापर हकमि रहल अछि, थाकल हिन्दुस्तान।

    स्रोत :
    • पुस्तक : चन्द्रनाथमिश्र ‘अमर’ रचना संचयन (पृष्ठ 372)
    • संपादक : योगानन्द झा, शम्भुनाथ झा, विजयदेव झा
    • रचनाकार : चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2025

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