ओ प्रिय!
तुम्हें
मेरी निरंतर उपस्थिति
उबने की हद तक बोझिल लगती है
कभी-कभी तुम्हें
मैं इतनी नापसंद होती हूँ
जितनी कि तुम्हारे बदन से टपकती
दुर्गंध से भरी पसीने की बूंदें
तुम चाहकर भी अपनी देह से
बहते पसीने के रिश्ते को तोड़ नहीं पाते
मैं भी तुम्हारी देह में छुपी
और आत्मा में बसी
प्रेम की वही एक बूंद हूँ
बहती हूँ प्रेम बनकर तुम्हारी रगों में
और नमक बनकर उतरती हूँ तुम्हारी देह से
तुम दुनिया के झँझावातों से टूटकर
जब अपने गर्म बिस्तर पर निढाल होते हो
और एक सुंदर ख़्वाब आँखों में उतरता है
तब तुम्हारी देह से लवणीय स्वेद बनकर बहने लगती हूँ
तब तुम मुझे इस हद तक पसंद करने लगते हो कि
तुम चाहते हो कि
मैं तुमसे सारी नैतिक वर्जनाओं को तोड़कर मिलूँ
तुम्हारे पुरुष मन को
अपने स्त्री मन के उस कोने का स्पर्श करने दूँ
जिसे पाने के लिए
तुम्हारा रचनाकार मन निरंतर कसमसाता रहा है
तुम्हारे भीतर
स्त्री छवि की निरावरण सुंदरता को
देखने की इच्छा तीव्र हो उठती है
तब तुम्हें अपना वही दुर्गंधयुक्त पसीना
अत्यंत मोहक और उर्जा का कारण लगता है
तुम सँभालते हो अपनी दुनियादारी
और रचते हो काल्पनिक दुनिया का यथार्थ
तुम्हारी महत्वाकांक्षाओं के आगे
व्यर्थ होती रही हैं पसीने की बूंदें
तुम रुकते ही नहीं
मुझे फिर से टालने की नाकाम कोशिशें करते हो
और इस तरह
नमक बनकर रहती हूँ सदा तुम्हारी देह में
और बहने लगती हूँ पसीने की तरह
प्रेम बनकर!
- रचनाकार : गरिमा सिंह
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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