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प्रेमाक टोहमे

premak tohme

राज

राज

प्रेमाक टोहमे

राज

और अधिकराज

    ककर मरजी स' बंटाइ छै धरती

    ककर मरजी स' बंटा जाइ छै अकास पर्यन्त

    एतबे कहाँ?

    एक-एक केँ बँटाइत

    मायक दूध धरि बँटा जाइ छै।

    अहूँ बूझै छियै जे

    के ऐ'?

    के पाबंदी लगा दैए हास-उल्लास के?

    के अगराही लगा जराबैए हरियर चासके?

    के दाहक बना दैए

    चानन बोनक छहरा?

    के तुलसी मदीना फूलक गाछ पर

    बैसा दैए विषधरक पहरा?

    के छीटैए माहुर केसर कियारीमे?

    के आनैए दरारि

    हरी, हरजीत, हजरत डेविडक भैयारीमे?

    के लगा दैए अड़ंगा बेर-बेर

    राष्ट्रक नव मोकामक तैयारीमे?

    के ऐछ जे कैलाश स' कन्याकुमारी धरि

    गरमाबैए

    भटकल के आर बेसी भरमाबैए

    धरमक तर्जमे अधरम के गीत गाबैए

    मूल मनुजता के हेंठ क'

    सरमो के सरमाबै-ए

    गामक चिन्हासे बनल डिहबार

    बरहमथान

    आकि

    पीर बबाक मजार

    किए यातना शिविरमे

    बदलि जाइ छै

    बेर-बेर

    एहि चिरकालीन

    पाशविक शिविरक

    हमसभ कियो

    एगो चिरंतन कुसुरबार।

    खाहें अहाँ

    कोला-कोला खेत बाँटू

    नदी आकि रेत बाँटू

    खाहें अलग-अलग नामक

    भलें रहौ किसान

    दाड़िमी, सिलहट, सतरिया

    आकि चाननचूर

    अनेक ठाम

    अनेक नाम

    छै मुदा सभ धान

    खाली धान

    जमा हेतै आखरिस

    बस एक्के खरिहान।

    सभक पेटक अकार

    बरोबरिये होइ छै भाय

    एक भूखे ओकर धरम

    एक अन्ने सम्प्रदाय।

    के ऐछ जे हमर-अहाँक

    सहज हंसी छीनि क'

    एगो कठहंसी

    एबजमे देब' अबैए

    सोचियौ ने! केना हेतै स्वीकार

    अविवेकी कोनो दुर्योधनक सहकार

    आकि उद्धत कोनो

    दुस्शासनक जयकार।

    दोहाइ ओइ पार के जनाब-सिरीमान

    झूठ के ल' धरमक नाम

    लीलाम जुनि करियौ

    वेद-कुरान

    व्यास, नानक, ईस

    मोहम्मदक ईमान

    सरेआम

    आजाद, भगत

    अशफाक के कि अब्दुल हमीदक

    शहादतक पतियानीमे

    नै जोड़ल जा सकै छै

    कोनो उन्मादीक नाम

    मोती आकि सोनाक भस्मक सङ

    छाउरक दाम।

    क्रांति छलै

    भ्रांति छियै

    धरम युद्ध छियै कहाँ?

    करम-धरम युद्ध छलै

    बेशरम धरम युद्ध छियै।

    एत' किए बेर-बेर

    दोहराइत रहै छै खिस्सा

    कि खधियाक दूध

    जखन लाल भ' जाइ

    त' बुझिहें जे माय मरि गेल

    कोनो अपस्वार्थी बाघक आंखिमे गरि गेल

    खधियाक दूध के अपलक निहारैत

    बैसल रहैए कतेको टूना

    किशोर, कतार, सलमा रूना।

    अहीं कहू ने! किए बेर-बेर

    सोनिता जाइ छै रावी चनाब

    हमरा चाही एक-एकक जवाब

    हिसाब-किताब।

    धरती स' आएलि सीता

    फेर किए धरतीयेमे समा जाइ छै?

    प्रेमक पर्याय बनलि राधा

    विष वनिता बनि

    किए भरमा जाइ छै?

    किए ऊघ' लगै छै जवान बेटाक लहास

    कनहा बुढ़ारी के?

    के लगले झाँपिक' बुता दै छै

    अहिबातक दियारी के?

    किए बेर-बेर अनचिनहार

    लाग' लगै छै अपन गाम

    अनचिनहार

    बस अनचिन्हार

    सभ ठाम

    के अप्पन? के आन?

    कोन पड़ाव? कोन ठेकान?

    अनभुवार भ' जाइ छै

    संगी संगिनि के काया धरि

    अनभुवार भ' जाइ छै अपनो छाहरि धरि

    जानि नै किए बेर-बेर

    मानवता एना कत' हेरा जाइ छै

    जिनगीक सभ तप्पत मनोरथ

    बेर-बेर एना किए सेरा जाइ छै?

    के जे खुशीक अवसर पर

    मातम पुरसी

    'गम' मनबैए

    कियो बेसी त' कियो कम कनबैए

    समग्र मानवता के टुकड़ी-पंजा करैत

    एटम बम बनबैए।

    अखियासियौ ने! मुरगा पपिहरा

    दूनू गबै छै भोरेक गीत

    कोइलीक कंठमे रहै छै वसंतक तीव्र आकांक्षा

    बुलबुलोक लोक सुरमे रहै छै भोरेक प्रीत।

    हे यौ! प्रेमा हमर प्रेयसी अनभुवारि

    मुखौटाक हाटमे हेरा गेलै

    धरमक मरम तक जा भेलै कहाँ

    भरमेमे अनबाटेमे घेरा गेलै

    आकि कोनो पहिकारक

    बनरघुरकी स' डेरा गेलै

    मुदा हमरा पूरा भरोस भाय!

    हमर प्रेमा हमरा फेर भेटत।

    हमर प्रेमा हमरा फेर भेटत॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : ऐ अकाबोन मे (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 16)
    • रचनाकार : राज
    • प्रकाशन : नवारम्भ, पटना
    • संस्करण : 2011

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