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प्रेम की वसीयत

prem ki vasiyat

पल्लवी जयराम

पल्लवी जयराम

प्रेम की वसीयत

पल्लवी जयराम

और अधिकपल्लवी जयराम

    शांत उपवन में सुनाई पड़े

    कोई मधुर-तान

    या किसी लेखक को

    बहु-प्रतीक्षित उपन्यास का

    छोर मिल जाए।

    अथवा मिल जाए

    माघ की बूंदों को

    गुलाब की महक,

    बसंती बयार को

    चमेली की संगत।

    ठीक उसी तरह मिली

    मेरे मन को कल्पना का

    मूर्त-रूप बनकर

    मेरे हर खालीपन को

    भर दिया

    किसी ने

    नवागत शिशु के आगमन की तरह।

    उम्र के प्रवाह से उपजी

    परिपक्वता को

    बाल-सुलभ मुस्कान ने

    चंचल बना दिया।

    तुम मुझे सहसा

    एक दिन नहीं मिले

    तुमसे हुआ

    पहला संवाद याद नहीं।

    याद है तो इतना कि

    मिलते ही लगा

    तुमसे ही मिलना था।

    कितने ही संवाद हुए

    मिलने से पहले

    परिचय से पहले।

    बात करते हुए लगा

    इसीलिए

    सीखी गई थी, भाषा।

    आँखें और कान

    तुमको पाकर

    सार्थक हुए।

    आज कल मेरा हृदय

    लंगड़ी का खेल खेलता है

    कभी स्नेह से भर जाता है

    कभी प्रेम से।

    कभी मचल उठता है

    आलिंगन को

    तो कभी

    दुलारना चाहता है।

    मैं जीवन में प्राप्त

    प्रत्येक संभावना में

    तुम्हें प्रेम करना चाहती हूँ।

    तुम अपनी उपस्थिति से

    उसे चतुर्गुणित करना।

    हमारा यह मिलन

    बन जाए काव्य

    जिसे देख और पढ़कर

    हमारी बेटी

    मुग्ध होती रहे।

    बेटे को लगे

    ऐसे ही प्रेम करना चाहिए।

    स्रोत :
    • रचनाकार : पल्लवी जयराम
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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