Font by Mehr Nastaliq Web

प्रेम की चाह में इच्छा बनी बाधक

prem ki chaah mein ichchha bani badhak

सुमन शेखर

सुमन शेखर

प्रेम की चाह में इच्छा बनी बाधक

सुमन शेखर

और अधिकसुमन शेखर

    हम जितना खेलते हैं

    उतना ही मुक्त होते जाते हैं

    कुछ खेल हमें जितना मुक्त करते हैं उतना ही बाँधते भी हैं

    चाहता हूँ निर्भीकता का रस बचाए चल पाना

    मैं कर्मठता को अमानवीयता सा देखने वालों का वंशज हूँ

    बहुतायत सत्य

    एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाते बदल जाता हैं

    मेरे स्वप्न में दिखा था नीला फूल

    मैं आज तक उसी फूल की तलाश में हूँ

    मुझे उम्मीद है कि बरसों बाद भी

    उसकी पंखुड़ियों में भरी होगी मेरी नींद की गंध

    प्रेम मेरे लिए उतना ही दूर रहा जितना नीला फूल

    फिर भी मैं अडिग रहा उस स्पर्श को किसी आस की तरह

    नहीं हूँ मैं ऐसा किरदार

    जो ठोक लूँगा नली प्रेमिका के मिलने पर

    बचता रहूँगा हरबार प्रतिबंधित हो जाने से

    अपने पुरखों के मुँह से निकला वाक्य हूँ जो श्लोक की तरह चहकता है

    इतिहास की निरंतरता, विकास और योजना को अपनी चोंच में बाँधे

    मेरी प्रेम कविताओं ने भारी कीमत चुकाई है

    बाज़ नहीं आए प्रेम और हिप्पियों को सहोदर मानने वाले

    ईश्वर का भी एक अंधेरा पक्ष है

    बहुत कुछ चूका है ईश्वर से

    नीले फूल की अबतक गंध आती है

    प्रेम की चाह में इच्छा बनी बाधक

    प्रेम के मिलने पर दौर कहाँ रहा शेष!!

    (बुनुएल, (हाइनरिख), वरदर (गेटे के उपन्यास का एक पात्र), शैलिङ्ग को पढ़ते हुए)

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुमन शेखर
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY