प्रेम की चाह में इच्छा बनी बाधक
prem ki chaah mein ichchha bani badhak
हम जितना खेलते हैं
उतना ही मुक्त होते जाते हैं
कुछ खेल हमें जितना मुक्त करते हैं उतना ही बाँधते भी हैं
चाहता हूँ निर्भीकता का रस बचाए चल पाना
मैं कर्मठता को अमानवीयता सा देखने वालों का वंशज हूँ
बहुतायत सत्य
एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाते बदल जाता हैं
मेरे स्वप्न में दिखा था नीला फूल
मैं आज तक उसी फूल की तलाश में हूँ
मुझे उम्मीद है कि बरसों बाद भी
उसकी पंखुड़ियों में भरी होगी मेरी नींद की गंध
प्रेम मेरे लिए उतना ही दूर रहा जितना नीला फूल
फिर भी मैं अडिग रहा उस स्पर्श को किसी आस की तरह
नहीं हूँ मैं ऐसा किरदार
जो ठोक लूँगा नली प्रेमिका के न मिलने पर
बचता रहूँगा हरबार प्रतिबंधित हो जाने से
अपने पुरखों के मुँह से निकला वाक्य हूँ जो श्लोक की तरह चहकता है
इतिहास की निरंतरता, विकास और योजना को अपनी चोंच में बाँधे
मेरी प्रेम कविताओं ने भारी कीमत चुकाई है
बाज़ नहीं आए प्रेम और हिप्पियों को सहोदर मानने वाले
ईश्वर का भी एक अंधेरा पक्ष है
बहुत कुछ चूका है ईश्वर से
नीले फूल की अबतक गंध आती है
प्रेम की चाह में इच्छा बनी बाधक
प्रेम के मिलने पर दौर कहाँ रहा शेष!!
(बुनुएल, (हाइनरिख), वरदर (गेटे के उपन्यास का एक पात्र), शैलिङ्ग को पढ़ते हुए)
- रचनाकार : सुमन शेखर
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.