Font by Mehr Nastaliq Web

प्रेम की भौगोलिक व्याख्या

prem ki bhaugolik vyakhya

रिदम राही

रिदम राही

प्रेम की भौगोलिक व्याख्या

रिदम राही

और अधिकरिदम राही

    सब कुछ इत्तिफ़ाक नहीं होता

    ब्रह्माँड में शक्तियाँ बहती हैं

    एक से दूसरी तरफ़

    हम किसी की आँखों में उतरकर

    वो सब कुछ पा लेते हैं

    जो मीलों चलकर नहीं मिलता

    मीलों की तलाश एक लंबी बहती नदी है

    जहाँ ठहरे हुए घाट हैं

    मद्धिम बहाव का इंतज़ार भी है

    किसी की उँगलियों में

    दिशाओं के सारे राज़ हैं

    किसी की हथेली पर दिल का

    दिशा-मापक यंत्र भी

    प्रेम की चुंबकीय शक्तियों में

    बेहद खिंचाव होता है

    ‘इत्तिफ़ाक था, जो मैं तुमसे मिला’

    यह कह देना

    आकर्षण की ऊर्जा के महत्त्व को

    कम करना है

    अंतर्मन के रास्तों से होकर

    शक्तियाँ ठहरती हैं

    धमनियों में बिजली की तरह दौड़ती हैं

    ब्रह्माँड के व्यास की तरह

    प्रेम की गहराई भी

    अज्ञात है

    अनंत है

    ब्रह्माँड, जहाँ अंतरिक्ष और उसकी अंतर्वस्तु

    निहित है

    तारे, गैलेक्सी किसी शक्ति ने बाँध रखे हैं

    इन्हीं शक्तियों के बीच प्रेम भी पलता है

    रोशनी के कणों के बीच

    ऊर्जा से भरा हुआ

    कोई नदी प्रेम की

    इस तरह सागर हो जाती है

    और सागर से आकाश

    और संघनित होकर

    पुनः धरती पर आकर मिलती है

    प्रेम की घटना भी

    भौगोलिक हो जाती है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : रिदम राही
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY