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पितामह भीष्म

pitamah bheeshm

संदीप द्विवेदी

संदीप द्विवेदी

पितामह भीष्म

संदीप द्विवेदी

और अधिकसंदीप द्विवेदी

    जब कथा करवटें लेती हो

    संदेश युद्ध का देती हो

    अंधियारी जब भीतर की

    हर उजियारा हर लेती हो

    ऐसे में दीपक रखने वाले

    अपने व्रत से ना डोले

    परिवार ने तोड़ी सीमाएँ

    क्यों वचन भीष्म ने तोड़े।

    धर्म की रक्षा करने वाला,

    अधर्म, देख क्या सकता था?

    अजर सिंह के सम्मुख कोई,

    भला गरज क्या सकता था?

    पर जैसे दशरथ वचनों ने

    राम का रथ वन को मोड़े

    वैसे ही गंगा पुत्र भीष्म,

    अपने पंजों के नख मोड़े

    परिवार ने तोड़ी सीमाएँ

    क्यों वचन भीष्म ने तोड़े।

    वह तो कर्तव्यों में रत था

    जीवन का एक यही व्रत था

    सत्य असत्य विदित था पर

    सत्य विरुद्ध खड़ा रथ था

    मृत्यु जिसे वैकल्पिक थी

    जिसको चाहे मारे छोड़े

    लेकिन सत्य और व्रत हित,

    वो ख़ुद जीवन का रथ तोड़े

    परिवार ने तोड़ी सीमाएँ

    क्यों वचन भीष्म ने तोड़े।

    दुःख तो होगा उनको भी

    क्यों ऐसी कठिन प्रतिज्ञा ली

    पर स्वयं नाथ जब उतरे थे

    कुछ बड़े न्याय की रचना थी

    जब नियति नियंता वहीं रहे

    मानव, तप से मुख क्यों मोड़े

    शायद सोच के ऐसा ही कुछ

    वचन भीष्म ने ना तोड़े।

    परिवार ने तोड़ी सीमाएँ

    पर वचन भीष्म ने ना तोड़े

    पर वचन भीष्म ने ना तोड़े

    वो सबको बेहद प्रिय थे

    गंगा के नीर सा बहते थे

    स्थान कहाँ ना था उनका

    वो कृष्ण हृदय में रहते थे

    गंगा ने जैसे भेजा था

    गंगा तक वैसे ही पहुँचे

    था कौन दूसरा उस युग में,

    जो इतना कुछ लेकर लौटे।

    स्रोत :
    • रचनाकार : संदीप द्विवेदी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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