पिताक नाम एगो कविता
pitak naam ego kavita
जहिया कहियो अदराक पहिल मुसलाधार बरखा हेतै
औतै धरतीमे परान
अगरा उठत सकल किसान
उमक' लागत ढाबुस बेंङ बरसाक आगमक सूचना दैत
मोसिम अनुकूल हेबाक
नवऋचा गबैत आ पीयर फूल स' लदल
गामक नवकनियाँ सन अलबटाहि
अलकेसरि अमलतासक गाछ
मोसिम के हकार' लागत
त' डाकक वचन सुनबैत
आकि अपने अनुभव स' ओकर मिलान करैत
पिता! अहाँ हमरा अबस्से मोन पड़ब
अबस्से मोन पड़ब
मोसिमक प्रत्येक अनुकूल आ प्रतिकूल छनमे
एकटा आस्थाशील अक्खड़ जुवारीसन
हारि-जीत के आशा स' हेंठ
पाशा पर पाशा फेकैत
बेर-बेर दाव लगबैत कखनो हारि, कखनो जीत
कखनो मीठ, कखनो तीत
सबा महज जेना जिनगीक रीत
निष्काम कर्मयोगक अनौपचारिक शिक्षा दैत
दृढ़ताक पाठ पढ़बैत पिता! अहाँक दीपित छवि
हमरा अबस्से मोन पड़त
की पिता! अहीं ने रहै छी
ग्रीष्मक उसम आतप मे तलफैत
श्रमजल के पिबैत
बिन कोनो परबाहक
सबटा सहैत
धरती स' अपन अधिकार के मंगैत
हरक लागनि आ फार स' भागक रेख के लिखैत
सृजनक नव छंद गढ़ैत
अहीं ने रहै छी पिता
अहीं ने रहै छी निसोदंड
जड़कलाक कन-कन रातिमे
कर्मठ हठयोगक सार्थक साधनामे लागल
भरथा चिड़ैक रैन-बसेरा सन
भुइयाँ सटल
खोपड़ीमे जागल
आकि धानक बुट्टी जरा
हाड़ के सेदैत
जाड़ के ललकारा दैत
अहीं ने रहै छी
जाड़ स' लड़क लेल
गोनैर आकि पटिया बिनैत
आकि धारक कछेरमे जाल सुखबैत
अहीं ने रहै छी
मरियाक ठकर-ठकर
हथकरघाक घरर-घरर
आकि भोरक दाओन के
बरदक गरा के घंटीके टन-टन सुनिक'
सरगम बजबैत
अहीं त' रहै छी पिता!
सरिपों, जिनगीक सर्जना, अनुभव आ ठहारक
नाम होइ छै पिता
जड़ता के विरोधमे
निरंतर गतिशील
जिनगीक थकान के दूर कर' बला
पीपर के गाछ होइ छै पिता
ओझरौटक घड़ीमे
बोधक बिरीछ होइ छै पिता
पिता! अहाँक ऊर्जावान स्मृति के जोगौने
निर्मल भावनाक
गंगाजल के
अरघ दैत
सृजनक पल-प्रतिपलमे
अहाँ अबस्से मोन पड़ब
अहाँ अबस्से मोन पड़ब पिता!
- पुस्तक : ऐ अकाबोन मे (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 11)
- रचनाकार : राज
- प्रकाशन : नवारम्भ, पटना
- संस्करण : 2011
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