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पत्तियों की मृत्यु

pattiyon ki mrityu

अनुवाद : श्यौराजसिंह जैन

स्लाव्को मिहालिच

स्लाव्को मिहालिच

पत्तियों की मृत्यु

स्लाव्को मिहालिच

और अधिकस्लाव्को मिहालिच

    और यों एक दिन

    मैं, जिसने हृदय से परिवर्तन चाहा

    —एक दिन प्रशंसाओं को अपनी प्रदर्शनी में रखते हुए

    सबसे छोटी गली में, पता ही है

    मैं बिना टोप के, हरेक में अपनी कमी तो होती ही है

    अपनी छोटी-सी गंदगी जिसे अधिकतर स्वयं ही भुगतता है

    विश्वासघात की क्षुद्र चमक काली भद्र आँखों में

    खुली खिड़की के सामने मैंने पेड़ देखा

    मैं, छटा पुराना खल, जिसे अभी तक मौक़ा नहीं मिला

    (आप आशा नहीं कर रहे, मुझे आशा है, कि अपना सब कुछ

    बता दूँगा

    आप तो क्षमा कर देंगे, मेरे लिए क्या रह जाएगा)

    इस आशय से नहीं कि कोई ऋण चुका दूँ, मैंने देखा

    जंगली चैस्टनट का पेड़ निर्लज्ज बड़ी पत्तियों वाला

    यदि मैं औरतें लाऊँ तो, परदे गिराने ही पड़ें

    धागे फिर भी छिपा पाएँगे कुचक्री निगाहों को

    प्यार करते हुए सुनता रहा कि खिड़की पर झूम रही हैं

    मानो संभावना रही हो कि उन्हें कमरे में बुला लूँगा

    सदय लोग यह सहन नहीं कर सकते कि उन्हें बुला लिया जाए

    (अब यहाँ भी आप मेरी सहायता करते लिखने में यदि पता

    होता कि बात क्या है)

    बड़ी काली पत्तियाँ जिन पर मैंने पहचान लिया एकाकीपन

    फिर प्रेम और उसके बाद विश्वासघात, अंत में निरर्थ

    एक शरद का जो गई थी बहुत पहले या बहुत देर से

    केवल याद है कि उसे लेने स्टेशन कोई नहीं आया था

    शायद हमें कुछ अधिक ही विश्वास था कि वह आए बिना नहीं

    रह सकती

    धोखा नहीं खाया हमने, लेकिन क्या सत्य ही सबमें काफ़ी है

    केवल बुद्धिमत्ताओं से ही प्रेम का पेट कौन भर सकता है

    (मेरी इच्छा बलवती है इन परिपूर्ण विषयों को कुरेद डालने की

    निर्दोष की गूँगी आँखें जिनके पीछे बदचलन प्रेम मुरझाते

    कोमल कर, क्योंकर भूल सके अपने कामुक प्रतिकारों को

    वे सुंदरतम शब्द रक्षा के सीखचों के पीछे धुँधले हो रहे

    हम भीमकाय बन सकते थे लेकिन मुश्किल से घास बन पाएँगे

    अपनी क़ब्र भी पीछे नहीं छोड़ जाएँगे

    क्या वरदान भरे हाथ लेकर नहीं आए

    हम अभागे इस क्षण में जब बुलावा आया है)

    मैंने पेड़ को सदा की भाँति ही देखा, उसे देखते हुए

    स्वयं को सब जगह खोजते हुए, आशा किए बिना कि कुछ बचा

    होगा

    आँखों के नीचे काले गड्ढों वाली उस चिड़चिड़ी शरद में

    जो सस्ती जर्जर पोशाक में, इससे अच्छे के पात्र हैं क्या हम

    शाखाओं पर दृष्टि दौड़ाते समय पत्तियों की ओर देखा

    बड़ी-बड़ी स्नेही आँखें कैसे भयपीड़ित मुझसे याचना करतीं

    और हवा कैसे काटती उनको शीत की धारों से

    और हममें से किसने विश्वास नहीं किया कि पत्तियाँ स्वेच्छा से

    जा रही हैं

    स्रोत :
    • पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 139)
    • संपादक : श्यौराजसिंह जैन
    • रचनाकार : स्लाव्को मिहालिच
    • प्रकाशन : बाहरी पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
    • संस्करण : 1978

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