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पत्र आयल गामसँ

patr aayal gamasan

बुद्धिनाथ झा

बुद्धिनाथ झा

पत्र आयल गामसँ

बुद्धिनाथ झा

और अधिकबुद्धिनाथ झा

    पढ़ऽ ले बैसल छी, पत्र आयल गामसँ

    ढबकल सब आखर, कपार परक घामसँ॥

    (1)

    गहूमक जे आस छल, पाथर सब चूड़ि देलक

    साओन मकइक बाढ़ि, बाढ़ि आबि थूड़ि देलक

    मरहन्नो छल तँ, मडुए के धन्न कही

    धानक भरोस करी, रहि-रहि उपास मरी।

    चैतक बेगरता बैसाख लगा बाँटब कि

    जेठहिमे घर खसल, अषाढ़ मास ठाठब कि

    साओनक इजोरिया लऽ भादव भरि चाटब कि

    आसिन तँ बीतले नञि, कतिकहर काटब कि?

    रोम-रोम सिहरैए, अगहन केर नामसँ

    ढबकल सब आखर, कपार परक घामसँ॥

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    (2)

    बाड़ीमे कक्काक बँसबिट्टी पसरि गेल

    खुट्टा जे अप्पन छल, अपनहि सटकि गेल

    केरा केर घौर छल, छौंड़ा सब काटि लेलक

    दक्षिण देआद सब, देल आड़ि छाँटि लेलक।

    लल्ला कि मुइला जे, पंचैति चल गेल

    सुच्चा तँ जे से जे, टलहा सब चलि गेल

    घानीसँ भारी बहतौनी, प्रपंच अछि

    लुच्चा सब गाम भरिक, पंच सरपंच अछि।

    लागय अन्हार व्योम, पूनम केर चानसँ

    ढ़बकल सब आखर, कपार परक घामसँ॥

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    (3)

    आन जकाँ अप्पन तँ, अपन दोआरि कोन

    ऋणहु पर धक्का तँ, पैंचक पुछारि कोन

    अपनहि ले लल्ल लोक, ककरा के ताकैए

    आँखि-पाँखि जकरा छै, काल्हिओ ले राखैए।

    लाजे बेगरता, बुधिआरो कठौत अछि

    जकरे दिसि ताकी से, चटकल सिलौट अछि

    पढुआ सब पढ़िओ कऽ, माछी रोमैत अछि

    बिसुखल थन गाय जकाँ, खुट्टा हनैत अछि।”

    किए ने खसै छै, छुच्छ खून चामसँ

    ढ़बकल सब आखर, कपार परक घामसँ॥

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    (4)

    खखसब वा आहट जँ ककरो पबैत छी

    संचमंच सुटकल धऽ खोंता रहैत छी

    मौगी जँ आँगनमे, ओहुना हँसैत अछि

    कोढ़िया सब साँढ़ जकाँ, ढेहुकी कसैत अछि।

    मोन होइए तैखन धऽ गरदनि ममोड़ि दी

    चाङुरसँ कोढ़ियाकेँ कोँढ़े खखोड़ि ली

    पिहुओ जँ रहितय तँ हँसैत-कनैत

    बिठुआ वा चुम्मा पर, सूतल-जगैत ओ।

    सोचै छी मीरा की, पुछलनि अछि श्यामसँ

    ढबकल सब आखर, कपार परक गामसँ॥

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    स्रोत :
    • पुस्तक : अक्षर निर्क्षर (मैथिली काव्य-संग्रह) (पृष्ठ 18)
    • रचनाकार : बुद्धिनाथ झा
    • प्रकाशन : क्रिएटिव कैम्पस प्रकाशन, हैदराबाद
    • संस्करण : 2015

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