पलायन
palayan
मैं हमेशा से
बच निकलती आई हूँ
जग भर के दुःखों से
जो मेरे हिस्से आने की फ़िराक़ में थे
वो डटे रहे मेरे सामने
और मैं किसी अपने का
सहारा लेकर बच निकल गई
वो अवसाद, वो पीड़ा
मेरा पीछे छोड़ने वाले क़तई न थे
लेकिन मैं चतुर ख़रगोश की तरह
बच निकल आती
'सब भाग्य का लिखा है जो पहले से तय है।'
मैं भी दिल बहलाती रही
और वो वेदनाएँ अब
अनगिनत कछुओं में तबदील हो गई हैं
वो कछुए मेरी देह के हर भाग में रेंग रहे हैं
मादा कछुए पेट से हैं
उनकी बढ़ती आबादी!
मैं बिस्तरबद्ध हो गई हूँ
मेरी उम्र घटती जा रही है
और मेरी पीड़ाएँ दुगुनी
बच निकलने की, न गुंजाइश है
न क्षमता
न ही हिम्मत
न ही इच्छा
मेरे अपने, जिन्हें मैं इस्तेमाल करती आई हूँ
वे मृत्युलोक से प्रस्थान कर चुके हैं।
उनके चेहरे मेरे आँखों के
सामने घूमते हैं
अट्टहास करते हैं मुझ पर
मैं आँखें मूँद लूँ तो
मेरी पलकों पर वे सब लोग चिपक गए हैं ढिठाई से
मेरी देह ज्वर से ग्रस्त है
मेरा ह्रदय धड़कता है तेज़ी से
ख़ून का प्रवाह बढ़ गया है
लहू फूट रहा है मेरे मुँह से
मैं इंतज़ार में समय काटती हूँ
आशा भर है जीने की
मृत्यु आसान कहाँ है
एक-एक अंग मेरा जब गल जाएगा
मुझमें रेंगेंगे मकोड़े
मैं किसी अँधेरी सुरंग में प्रवेश कर जाऊँ
फिर रोशनी की संभावना है शायद
मैं आशावादी हूँ या पलायनवादी
लेकिन अब इन अनगिनत कछुओं की चपेट से
बच निकलने की तरकीब नहीं लगाती।
- रचनाकार : ऋचा कश्यप
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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