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पाकिस्तान के हुक्मरानों के नाम एक पत्र

pakistan ke hukmranon ke naam ek patr

उदय प्रताप सिंह

उदय प्रताप सिंह

पाकिस्तान के हुक्मरानों के नाम एक पत्र

उदय प्रताप सिंह

और अधिकउदय प्रताप सिंह

    अहसानफ़रामोशो सोचो, क्या हमने तुमको दिया नहीं

    ऐसा उपकार कौन-सा है जो हमने तुम पर किया नहीं

    आज़ादी की देवी का मुँह माँगा मोल दिया तुमको

    माँ के लोहू से सराबोर घायल भूगोल दिया तुमको।

    इतनी अपनी मजबूरी थी, इतिहास नहीं देने पाए

    अविभाज्य शौर्य होता है, ये विश्वास नहीं देने पाए

    पतझड़ के मानस पुत्रों को मधुमास नहीं देने पाए

    गांधी-गौतम के चिंतन का भुजपाश नहीं देने पाए।

    मायूस पड़ोसी बनकर तुम नहरों का नीर माँगते हो

    लेकिन धर्माध निगाहों से हमसे कश्मीर माँगते हो

    ये काश्मीर हम दे भी दें तो ताजमहल माँगोगे तुम

    पूनम की रातों में यमुना का हुस्ने-ग़ज़ल माँगोगे तुम।

    फिर सबसे अच्छे गुलशन की बुलबुल की सदाएँ माँगोगे

    जो रास रसूलों को आईं वो ठँडी हवाएँ माँगोंगे

    फिर इसी तरह के और बहुत से क़ौमी निशाँ माँगोगे तुम

    सहगल के स्वर में ग़ालिब का अंदाज़े बयाँ माँगोगे तुम।

    फिर वीर हमीद की सीने की यो देशभक्ति माँगोगे तुम

    गोली पर गोली खाने की वह प्राणशक्ति माँगोगे तुमः

    रसखान सुकवि था मुसलमान क्या उसका कान्हा भी दे दें?

    क्या बाज बहादुर रूपमती का मधुर तराना भी दे दें ?

    तुम तो शायद अकबर को भी बतलाते होगे मुसलमान

    इतिहास मगर ये कहता है वो था केवल अकबर महान

    जिसने सब धर्मों से उठकर इंसानों को इंसान कहा

    हिल-मिलकर जीवित रहने को ही सर्वश्रेष्ठ ईमान कहा।

    वो हिंदू है तो अच्छा है, है मुसलमान तो अच्छा है

    उसका जीवन है वंदनीय, इंसान हुआ जो अच्छा है

    इसलिए तुम्हें समझाते हैं, मत काश्मीर पर ललचाओ

    अगली पीढ़ी का स्वर समझो, जपनी जनता को समझाओ

    अब जिसे देखकर रोते हो, वह सब उत्कर्ष तुम्हारा था

    ये केवल कश्मीर ही क्या? सब भारतवर्ष तुम्हारा था

    पहले से त्रस्त मनुजता को मत और युद्ध से त्रस्त करो

    कुछ और प्रश्न भी हैं जिन पर जनमत का बंदोबस्त करो।

    खेतों की मुलायम धरती पर हल-बैल चलेंगे या गोली

    फसलों को गिराएँगी फ़ौजें या हँसियों की हँसती टोली

    अगली पीढ़ी को अमन-चैन या लाशों की संख्या दोगे

    समझाओं इन्हें वसीयत में अपनी करनी का क्या दोगे

    किस-किसको युद्ध गवारा है, किस-किसको रोटी प्यारी है

    यह प्रश्न पूछते जनता से ये भी ती रायशुमारी है

    इसलिए तुम्हें समझाते हैं मत काश्मीर पर ललचाओ

    अगली पीढ़ी का स्वर समझो अपनी जनता को समझाओ।

    जिनके कंधों पर रख कर, यह बंदूक चलाई जाती है

    जिनके पेटों पर लात मार, यह लड़ी लड़ाई जाती है

    यद्यपि सच है उन लोगों का, जीना भी कैसा जीना है

    उन्हें अनादर के प्याले में, जीवनभर विष पीना है।

    फिर भी उनसे तो पूछो, क्या कश्मीर चाहते हो भाई

    या अपने तन के टुकड़ों की, सीमा पर जलती तरुणाई

    इसलिए तुम्हें समझाते हैं, मत काश्मीर पर ललचाओ

    अगली पीढ़ी का स्वर समझो, अपनी जनता को समझाओ।

    स्रोत :
    • रचनाकार : उदय प्रताप सिंह
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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