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पगडंडिया

pagDanDiya

नरेश मेहन

नरेश मेहन

पगडंडिया

नरेश मेहन

और अधिकनरेश मेहन

    अपनी

    पदचाप सुनना

    मुड़कर अपने पैरों के

    निशान देखना

    लगता है

    कितना मधुर।

    झाड़ियों से

    लताओं से

    बातें करना

    भंवरो का

    संगीत सुनना

    लगता है

    कितना मनोरम।

    जहाँ पर

    हर क़दम

    हर ताल में

    संगीत की

    रचना हो

    तुम उनके संग

    वह तुम्हारे संग।

    पगडंडियों का

    यह संगीत

    दुनिया भर की

    हिंसक सड़कों

    धुआँ उगलते

    वाहनों का

    कितना

    मासूम-सा जवाब है।

    पगडंडियाँ

    सदा सुहावनी

    मन- मोहक

    अपनी-सी लगती है।

    सड़कों पर

    परायेपन की

    गंध आती है।

    हिंसा

    सड़कों का धर्म है

    स्नेह

    पगडंडियों का मर्म है।

    आओ

    स्नेह की महक से

    हिंसा की गंध मिटाए।

    सड़कों की

    पथरीली लयहीन

    आंधी दौड़ से बचें

    जड़ों से जुड़ना सीखे।

    अगर आप भी

    लेना चाहते हैं

    प्रकृति के संगीत का

    भौरों की गुंजार का

    पेड़ों से आती

    शीतल बयार का आनंद

    तो पेड़ों को

    काटो मत

    झाड़ियों लताओं

    को उखाड़ो मत।

    उनके बीच

    तलाशो कोई पगडँडी

    जो थी कभी

    हमारे आस-पास।

    स्रोत :
    • रचनाकार : नरेश मेहन
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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