नींद मौत का छोटा-छोटा टुकड़ा है
neend maut ka chhota chhota tukDa hai
सोते समय मुझे अक्सर ज़ोर की हिचकी आती है
उठकर पानी लेता हूँ, अँधेरे मे खड़े पिता मुस्कुराते हैं
पिता, जिन्हें गए चार साल हो गए
चार साल!
आकर बिस्तर पर लेट जाता हूँ
पिता ग़ायब हो जाते हैं ठीक उसी तरह
जैसे वह छोड़कर गए और कभी वापस नहीं लौटे
मृत्यु ने उन्हें बूढ़ा नहीं होने दिया
माँ उनसे तीन बरस छोटी हुआ करती थीं
अब वो पिता से एक बरस बड़ी हो गईं हैं
पिता की तरह घर के कोने में बैठी पाई जाती हैं
कभी-कभी माँ की शक्ल पर पिता की आकृति उभर आती हैं
माँ की मुस्कान इस वक़्त
दुनियाँ की सबसे लाचार और उदास मुस्कान-सी दिखती है
पिता को सोचते हुए
उनका चेहरा कम उनकी मुस्कान ज़्यादा दिखती है
उनकी घनी मूँछ, आँखों में तेज़ और उनकी उंगलियाँ,
जो पहले की तरह ही शब्दों के साथ खेल रही होती हैं
पहली कक्षा में था, एक सवाल पूछ बैठा था उनसे—
“आपकी उँगलियों में इतना शब्द आता कहाँ से है?”
उन्होंने मुस्कुराकर कहा—
“मेरी उम्र तक आते पिता के सारे राज़ जान जाओगे, फिर बात करेंगे”
आज मैं उस उम्र के क़रीब की तरफ़ ही हूँ
लेकिन बताने वाले पिता पकड़ से बहुत दूर निकल चुके हैं
पिता के राज संदूक में बंद रह गए
उसकी चाभी समंदर में गुम है
मैं मछली-सी फिर भी भटक रहा हूँ अंतहीन रास्तों पर
एकांत में बैठा मैं, छोड़ देता हूँ कई-कई सवाल हवा में
इन चार सालों में मेरे आस-पास का ब्रह्माँड भर गया है सवालों से
सवालों पर अब सीलन की-सी महक आती है, जवाब नहीं आता
जबकि जानता हूँ कि उन जवाबों के पंख कट गए हैं
पिता तक पहुँचने के रास्ते पर धुँध गहराता जा रहा है
पिता मुस्कुराकर हर रात अंधेरे मे विलीन हो जाते हैं
मैं हर रात टकटकी लगाए खाकसारी से उन्हें देखता हूँ कि शायद रुक जाएँ
पिता इतने निर्मम तो न थे!
सुबह से रात का इंतज़ार करता हूँ
नींद मेरे सवालों की उम्मीद है
नींद मौत का छोटा-छोटा टुकड़ा है
मैं टुकड़े-टुकड़े में पिता को सहेजता हूँ
पिता जितना पास हैं, उतने ही दूर-दूर।
- रचनाकार : सुमन शेखर
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.