नज़दीकियाँ ही नियति बन जाती है!
nazdikiyan hi niyti ban jati hai!
एहसास का कोना-कोना
महक रहा है तुम्हारी ख़ुशबू से
मन विस्मित है कि
तुम्हें सोचने मात्र से ही
कैसे महक उठा मेरा संपूर्ण अस्तित्व;
पास न होकर भी
हर पल साथ होने का सुकून है।
हमारे बीच की दूरियाँ
नापी नहीं जा सकती,
न मीलों में न वर्षों में
न तरंगों की चालों में,
अगणित दूरियाँ भी
बेबस हो चली हैं
मन के वेग से;
फिर हम शोक क्यों करें
इन अगणित फासलों का
जो बाहर से दिखती तो है
परन्तु पलक झपकते ही
ओझल हो जाती है।
बंद आँखों से नहीं रह जाता
फासलों का रत्तीभर भ्रम
और तब नज़दीकियाँ ही
हमारी नियति बन जाती है।
अरमानों के गुलशन में
रंग बिरंगे फूलों का सौंदर्य
फीका पड़ जाता है
तुम्हारे अनुपम सौंदर्य के समक्ष
और तुम्हारी ख़ुशबू से
महक उठता है मेरा संपूर्ण अस्तित्व।
- रचनाकार : प्रदीप बहराइची
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.