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नारों के आदर्श महल में श्रम की लाश कफ़न को तरसे

naron ke adarsh mahl mein shram ki laash kafan ko tarse

उदय प्रताप सिंह

उदय प्रताप सिंह

नारों के आदर्श महल में श्रम की लाश कफ़न को तरसे

उदय प्रताप सिंह

और अधिकउदय प्रताप सिंह

    मेरी क़लम जागती रहना, तेरा काम अभी बाक़ी है

    वादों के ताज़िये गगन तक खड़े हुए चौराहों पर

    लेकिन उनका बोझ पड़ रहा जनता की निर्बल बाँहों पर

    आखिर इसका फल क्या होगा सोचें प्रतिभावान मनीषी

    अगर चिकित्सक दवा बताकर देते रहें ज़हर की शीशी

    रामराज्य में हरिश्चंद्र की वाणी सत्य वचन को तरसे

    मेरी क़लम जागती रहना, तेरा काम अभी बाक़ी है

    क्या जुलूस है आगे अंधे पीछे सब गूँगे-बहरे हैं

    जो सक्षम हैं वे लज्जा के मारे पर्दों में ठहरे हैं

    नया ख़ून आगे आने के बदले पीछे क्रुद्ध खड़ा है

    इस सारे जुलूस के ऊपर मुँहबाए गृहयुद्ध खड़ा है

    मजबूरी-सी मजबूरी है जीवन स्वयं मरण को तरसे

    मेरी क़लम जागती रहना, तेरा काम अभी बाक़ी है।

    कभी-कभी सोचा करता हूँ वे बेचारे छले गए हैं

    जो फूलों का मौसम लाने की कोशिश में चले गए हैं

    जो स्वतंत्रता के चरणों में अपना शीश चढ़ाकर सोए

    हममें से कितने ऐसे हैं उनके लिए हृदय से रोए

    उन वीरों की विधवाओं के क्वारे स्वप्न सृजन को तरसें

    मेरी क़लम जागती रहना, तेरा काम अभी बाक़ी है

    आज़ादी से रजत जयंती तक इतना उत्थान हुआ है

    महँगाई हो गई सयानी, भ्रष्टाचार जवान हुआ है

    अपनी परछाई की तुलना में बौना इंसान हुआ है

    साफ़ पता चलता है जीवन मूल्यों का अवसान हुआ है

    कोई वजह सही पर यह क्या? दिन में आँख किरन को तरसे

    मेरी कलम जागती रहना तेरा काम अभी बाकी है

    स्रोत :
    • रचनाकार : उदय प्रताप सिंह
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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