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नन्हें काले फ़रिश्ते

nanhen kale farishte

ओरलांदो एमानुएल्स

ओरलांदो एमानुएल्स

नन्हें काले फ़रिश्ते

ओरलांदो एमानुएल्स

और अधिकओरलांदो एमानुएल्स

    तुम्हें याद है माँ कैसे नाचता था मैं

    नन्हें-नन्हें काले पाँव

    लड़खड़ाते

    हवा के झोंके से भी

    तुम मुस्कुराती थी नाचता था जब मैं

    और दमकता था तुम्हारा चेहरा

    जब तुम्हारे मित्र तुमसे कहते

    कैसे नाचता है तुम्हारा नन्हा फ़रिश्ता

    मैं नाचता हुआ स्कूल जाता

    नाचता घर लौटता

    जब बरसात में आसमान धरती डुबो देता

    और मैं उस सैलाब में

    छपा-छप खेलता पानी से

    तुम देख रही होती पीछे की खिड़की से

    तुम देख रही होती थी

    अपने काले फ़रिश्ते को

    अपने खेल में मग्न

    आसमान पर खींचते टेड़ी-मेढ़ी लकीरें

    पीले हरे सफ़ेद और बैंगनी फ़रिश्ते

    संगी-साथी उसके बरखा नृत्य के

    मैं हमेशा नाचना चाहता

    तुम्हें और अपने आपको ख़ुश रखने के लिए

    तुम हमेशा हँसती

    मुझे ख़ुश देखने के लिए

    शायद इसीलिए माँ

    तुमने मुझे जीवन एक स्वप्न-सा दिया

    और चुप्पी साध ली सच्चाई के बारे में

    दुनिया की उस सच्चाई के बारे में

    जहाँ फ़रिश्ते हमेशा श्वेत होते हैं

    हाथी दाँत जैसे श्वेत

    काले कभी नहीं

    चित्रों में चर्चों की मूर्तियों में

    परीकथाओं में भी नहीं

    पर जब कभी बचपन का वह समय

    मुझे गले लगाता है

    और मैं तुम्हारी मुस्कुराती नज़रों तले

    फिर से होता हूँ बरखा नृत्य में

    बहावों की यादों और ख़ुशियों से ढँके

    ठीक जैसे लौरेल पत्तों की मालाओं से

    और फिर एक काला जिब्रील देखता प्यार से

    नन्हें पैरों को

    जो नाचते हवा की ताल पर

    'नाचो नन्हें फ़रिश्तो कहता जिब्रील विशाल-काला

    नाचो और हँसो और ख़ुश रहो

    तुम्हारे होने का सच

    केवल एक झूठ है श्वेत आदमी का।

    स्रोत :
    • पुस्तक : यह संपन्नता बिखरी हुई (पृष्ठ 123)
    • संपादक : श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
    • रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी एवं ग्रूलाक
    • संस्करण : 2006

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