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नम्र निवेदन या महा प्रत्याशा

namr nivedan ya maha pratyasha

अनुवाद : श्यौराजसिंह जैन

द्रागो इवानीषेविच

द्रागो इवानीषेविच

नम्र निवेदन या महा प्रत्याशा

द्रागो इवानीषेविच

और अधिकद्रागो इवानीषेविच

    और अंत में माटी मुँह में

    पर घटेगा प्रकाश कहते हो

    चाहता हूँ कि तुम्हारा विश्वास करूँ

    घटेगा प्रकाश तुम्हारे साथ दुहराता हूँ

    इस रात में

    चाहता हूँ कि तुम्हारा विश्वास करूँ

    होगा प्रकाश घटित, फैले हाथ!

    कितने हैं ओरपास

    पाषाण स्वरों के पाषाण अक्षरों के

    काली दुष्ट घासों के

    अंकुरित होतीं जो

    भयावह आंतरिक नीरवता से

    पर घटेगा प्रकाश कहते हो

    और अंत में माटी मुँह में कहते हो

    और अंत में एक ही बात है

    तुम दुहराते हो

    श्मशान-यात्राएँ मेरे सपनों में

    और उसके जो चुकाता दिन मेरी ही तरह

    वह और मैं जो नंगे और अपघटित फिरते हैं

    निशा हम में हमारी सीमाओं में—

    फैले हाथ!

    घूमते हैं क़दम से क़दम मिलाकर

    (क्या अंतर पड़ता है कहते हो)

    अपलक देख लेते हैं अपने चारों ओर

    अपघटित

    घूमते हैं अविच्छेद्य वह और मैं

    निशा में निशा

    पर घटेगा प्रकाश दुहराता मैं तुम्हारे साथ

    मैं निशा संग निशा

    निशा की सीमा तक

    संभवत: तुम्हें भावी भ्रात

    प्रकाश उज्ज्वलित करेगा

    स्रोत :
    • पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 81)
    • संपादक : श्यौराजसिंह जैन
    • रचनाकार : द्रागो इवानीषेविच
    • प्रकाशन : बाहरी पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
    • संस्करण : 1978

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