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धूमकेतु के पहरुवे

dhumaketu ke paharuve

अनुवाद : सुरेश सलिल

फेरेन्त्स यूहाश

अन्य

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फेरेन्त्स यूहाश

धूमकेतु के पहरुवे

फेरेन्त्स यूहाश

और अधिकफेरेन्त्स यूहाश

    ग्रीष्म की एक अंधी और चुप रात्रि

    किसी ने हमारे घर की खिड़की पर थपथप की—

    'बाहर आओ! बाहर आओ!

    कैसा तो चमत्कार ! वहाँ, आसमान में!'

    बिस्तर से कूदे हम, देखें, क्या है आख़िर?

    कोई रहस्य-सूत्र नक्षत्रलोक से?

    माँ का हाथ मैंने कस कर पकड़ा, गरमाहट थी उसमें

    लगा; दिल धड़कता हो मानो उसका मेरे करतल में।

    नंगे पाँव, सिर्फ़ क़मीज़ों में और जाँघियों में

    पूरा गाँव जुटा था बाहर खुले शीत में;

    सहमी-ससेटी हुई बूढ़ी औरतें, भावहीन बदरंग चेहरे

    परलोक की रंगहीन रोशनी में जमे हुए।

    अकिंचनजन गली में ठठ-के-ठठ जुटे

    औरतों ने सीने पर बाँहों से क्रूस खड़े कर लिए।

    टकटकी बाँधी उन्होंने आसमान पर, तो घुटनों में उनके कँपकँपी

    दौड़ गई

    —कोई परीकथा या कोई पाक इलहाम!

    उधर पहाड़ी पर; तारों की अनूठी कलाकारी वाला आसमान

    जलते पुआल से भी बहुत तेज़ धधक उठा—

    दीखा एक वृषभ-अश्व पंखयुक्त, हीरे जैसे द्युतिमान उसके अयाल

    साक्षात् अग्निज्वाल, हिलती हुई पूँछ उसकी रक्त-रंगी लाल-लाल।

    जड़ों की भाँति; मैंने माँ का हाथ कस कर जकड़ लिया;

    गर्माइश उसके बदन की अब तक मुझे याद है,

    और पिता ऊपर उस अश्व की ओर उँगली ऊँचाए

    अपने ही पसीने की लपटों से जो प्रभावित था।

    उड़ गया उद्धत वह छतों के ऊपर से, हम निश्चल खड़े रहे

    समाधि-शिलाओं जैसे; उसकी कोपोद्दीपित प्रभा में।

    उसके जा चुकने पर आसमान अतिशय रहस्यमय हो गया।

    धूमकेतुओं की नियति, छलना, हमारी आशा!

    स्रोत :
    • पुस्तक : रोशनी की खिड़कियाँ (पृष्ठ 376)
    • रचनाकार : फेरेन्त्स यूहाश
    • प्रकाशन : मेधा बुक्स
    • संस्करण : 2003

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