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मोरे गँउआ म फगुनी बयार चली है

more ganua ma phaguni bayar chali hai

परवाना प्रतापगढ़ी

परवाना प्रतापगढ़ी

मोरे गँउआ म फगुनी बयार चली है

परवाना प्रतापगढ़ी

और अधिकपरवाना प्रतापगढ़ी

    मोरे गँउवा फगुनी बयार चली है,

    होलिन रँग कै फुहार चली है,

    तन-मन रँग जाई रँग जाई चोलिया,

    बहुत नीक लागै देवरवा कै बोलिया,

    गुलाल अबीर की बहार चली है।

    होलिन...

    गोरे-गोरे गाल पे लगाये गोरी रँगना,

    मथवा पै टिकुली हथवा कँगना,

    आज घुँघटा पतोहिया उधार चली है।

    होलिन...

    जब होली मिलन चलै लरिकन कै टोली,

    भरत ठहाका चलै करत के ठिठोली,

    गोरी मुड़ि-मुड़ि के रहिया निहार चली है

    होलिन...

    लाल रंग लागै हो धरती गगनवा,

    कइयो रँग फुलवा फुलायग अँगनवा,

    'परवाना कै जियरा निकार चली है

    होलिन...

    स्रोत :
    • पुस्तक : रस गागरी (पृष्ठ 16)
    • रचनाकार : परवाना प्रतापगढ़ी
    • प्रकाशन : अभिव्यक्ति संगम, साहित्यिक संस्था, लालगंज प्रतापगढ़
    • संस्करण : 2013

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