हम अहाँक, अहाँ हमर छी
hum ahank, ahan hamar chhi
हम अहाँक, अहाँ हमर छी।
एक भाषा, एक भूषा, सभक मिथिला-देश घर छी॥
अतीतक अभिमानमे, सब-टा अपन हम सत्त्व त्यागल,
मोहमे रहलहुँ पड़ल, जहिआ अखिल छल विश्व जागल।
चेतना-मय द्विजक दल आएल, घुरल कहि नीति-वाणी,
मनक उपवन देखि उमड़ल, बनल विमुख वसन्त मानी।
लखल नहि आलोक, रहि अभिमानमे हम पैघ नर छी।
हम अहाँक, अहाँ हमर छी'।
किन्तु समयक गति विलक्षण, आइ सुखद-प्रभात आएल,
स्फूर्ति अपना सङ्ग नव उत्साह, नव उल्लास लाएल।
भेल अछि नव-जागरण गबइछ जागृति-गीत कण-कण,
मन मलिन नहि बनत तँ सम्भव अवश्य असाध्य साधन।
जखन छथि नेता 'अमर-पति' 1 तखन हमहूँ सभ अमर छी॥
हम अहाँक, अहाँ हमर छी।
- पुस्तक : भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’ रचना-संचयन (पृष्ठ 111)
- संपादक : अजीत मिश्र
- रचनाकार : भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’
- प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
- संस्करण : 2024
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