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मेरे शहर से लौटती ट्रेन

mere shahr se lautti tren

मधु चतुर्वेदी

मधु चतुर्वेदी

मेरे शहर से लौटती ट्रेन

मधु चतुर्वेदी

और अधिकमधु चतुर्वेदी

    मेरे शहर से लौटते वक़्त

    ट्रेन हौले-हौले

    प्लेटफ़ॉर्म छोड़ने लगती है

    मेरा शहर

    नज़रों के दायरे से

    धीरे-धीरे फिसलने लगता है

    प्लेटफ़ॉर्म पर खड़े

    अनजान चेहरे

    अपने ही में मशग़ूल—

    ठेले, खोमचे, टोकरियाँ,

    अख़बार बेचता लड़का…

    खिड़की के पास से

    हर नज़ारा गुज़रने लगता है

    मेरी रुख़्सत से बेपरवाह

    ये सारे लोग

    कल भी

    यहीं की गलियों में घूमेंगे

    ये वे ख़ुशनसीब हैं

    जो अपने शहर में रहते हैं

    ट्रेन ने पकड़ ली रवानी—

    धीमे-धीमे

    हिचकोले खाते हुए

    मैं खिड़की से गुज़रते

    ज़र्रे-ज़र्रे को

    डबडबाई आँखों में

    भर लेने की कोशिश में हूँ

    ओझल हो गया

    ‘जंक्शन’ के साथ लिखा

    मेरे शहर के नाम वाला

    पीली रंगत का रेलवे-बोर्ड

    जैसे पैरों के नीचे से

    ज़मीन खिसक गई हो

    साथ-साथ चलते

    प्लेटफ़ॉर्म से भी

    रिश्ता टूटता है

    पटरियों की सरपट के साथ

    धागे ढीले होते जाते हैं

    दुकानें,

    बिजली के खंभे,

    धीरे-धीरे ओझल

    विपरीत दिशा में दौड़ती

    जानी-पहचानी

    बदरंग इमारतें

    छूटती जाती हैं

    मेरी तफ़रीह वाली सड़कें,

    मंदिर,

    बाज़ार...

    दूर मैदान में खेलते बच्चे—

    बेअसर इस बात से

    कि कोई इस शहर में अपनी जड़ें छोड़

    कटने का गहरा घाव लिए

    बहुत दूर जा रहा है

    कभी मैं यहाँ रहती थी

    अब

    यह

    शहर

    मेरे

    भीतर

    रहता

    है

    जब मेरे शहर से लौटती ट्रेन छूटती है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : मधु चतुर्वेदी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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