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मेरा शहर

mera shahr

गरिमा सिंह

गरिमा सिंह

मेरा शहर

गरिमा सिंह

और अधिकगरिमा सिंह

    राजधानी से लगा हुआ

    मेरा शहर

    हर बात की बात जानता है

    वह हर बदलाव को

    क़रीब से देखता है

    हर मुद्दे पर

    बोलता है

    बिना महसूस किए…

    धर्म, जाति और हिंसा के मुद्दे

    पर हैरान होता है...

    और चुप हो जाना मुनासिब समझता है

    कि क्या फ़र्क़ पड़ता है?

    क्योंकि—

    हम तो शहर हैं

    और शहर तो जलता ही है!

    हम जलेंगे नहीं

    तो रहेंगे नहीं

    मेरे शहर में ही

    रहती है राजनीति

    गलियाँ थोड़ी तंग हैं

    लेकिन हम सभ्य नागरिक

    सहिष्णु, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक हैं

    हमने सीखा है यह—संविधान से

    भाषण, धरना, हड़ताल, कैंडल मार्च से

    ख़ुद को जागरूक रखता है

    मेरा शहर

    और फिर अगली सुबह

    अपने काम पर लौट आता है

    अनुशासित है मेरा शहर

    ख़ूब पढ़ता है किताबें

    और बातें करता है कानून की

    साहित्य, विज्ञान और कलाओं की

    वह जानता है कि कितनी ज़रूरी है

    हमारी सरकार, न्याय—व्यवस्था

    हमारे बेहतर जीवन के लिए

    लेकिन आजकल

    असभ्य लोगों की मनमानियाँ

    बहुत बढ़ गई हैं हमारे शहर में

    नहीं तो…

    हमारा शहर बहुत सुंदर है

    जो चुपचाप?

    अपना काम करता है…

    स्रोत :
    • रचनाकार : गरिमा सिंह
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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