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मीत संध्या

meet sandhya

ज्ञानवती सक्सेना

ज्ञानवती सक्सेना

मीत संध्या

ज्ञानवती सक्सेना

और अधिकज्ञानवती सक्सेना

    मीत संध्या—

    ढल गई या

    नैन मुँदते जा रहे हैं

    प्रज्ज्वलित

    दीपक नहीं या

    प्राण बुझते जा रहे हैं

    क्या घिरे हैं

    घन गगन में

    या तुम्हारा मन भरा है

    मौन कैसे

    हो गए प्रिय

    आँख से आँसू गिरा है

    लग रही

    आँधी घिरी है

    पात उड़ते जा रहे हैं

    थाम लो

    इस जीर्ण तन को

    यह समझ लो बाँसुरी हूँ

    स्नेह-गंधा

    माधुरी थी

    आज सूखी पाँखुरी हूँ

    मीत उपसंहार

    वेला

    पृष्ठ मुड़ते जा रहे हैं

    आज अंतिम बार

    अपनी

    कनु-प्रिया के दृग निहारो

    दृश्य पर

    गिरती यवनिका

    पात्र छुपते जा रहे हैं

    है तुम्हारे

    अंक में सिर

    प्यार से सहला रहे हो

    तीर्थ मेरे

    घाट अपने

    अश्नु से नहला रहे हो

    भाग्यवान

    एक मुझसा

    पुण्य जुड़ते जा रहे हैं

    स्रोत :
    • पुस्तक : राधा की अंतिम यात्रा (पृष्ठ 38)
    • रचनाकार : ज्ञानवती सक्सेना
    • प्रकाशन : श्रीमती लीला गुप्ता
    • संस्करण : 1999

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