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मैं तुमसे मिलने आती हूँ

main tumse milne aati hoon

ऋषिता सिंह

ऋषिता सिंह

मैं तुमसे मिलने आती हूँ

ऋषिता सिंह

और अधिकऋषिता सिंह

    प्रेम की समस्त असंभवनावों के बीच मैं तुमसे मिलने आती हूँ!

    समाजवाद के सभी शिलालेखों को कंठस्थ किए

    मैं पर्वतो में मार्ग बनाती हूँ—

    मेरे प्रेम को शायद कविता से अधिक अब क्रांति की आवश्यकता है

    सिंधु की सभ्यता से सुकरात की व्यवस्था तक—

    तुम्हारे वर्गीकृत सामाज को ध्वस्त करते,

    मैं दशरथ माझी बन जाती हूँ

    प्रेम की समस्त असंभवनावों के बीच मैं तुमसे मिलने आती हूँ!

    तुम्हारे और मेरे नाम के बीच एक लंबी कतार है

    वंचितों की पीड़ितों की,

    धर्म, जाती और कुल के मठाधीशों की!

    तुम्हारे और मेरे नाम के बीच आते है हमारे उपनाम

    जो दर्प और दया में बंधकर—

    मानवता को लज्जित किए जाते हैं

    रूढ़िवादी सोचों की और स्मृतियों की,

    ग्रंथो की, आहुति चढ़ाती हूँ

    प्रेम की समस्त असंभवनावों के बीच मैं तुमसे मिलने आती हूँ!

    तुम्हारा मिलना काव्य नहीं,

    शताब्दियों की त्रास का स्वाभाविक समाधान था!

    तुम्हारा मिलना सहस्त्र कर्ण—नो का प्रतिवाद था,

    तुम्हारा मिलना विद्रोही का संवाद था!

    लाल रक्त बहता जो शीरा में उनको पताक बनाती हूँ

    और इस क्रांति की अंतिम सीडी पर मैं तुमको ही तो पाती हूँ

    प्रियतम, प्रेम की, मिलन की और अधिकारों की

    समस्त असंभवनावों के बीच मैं तुमसे मिलने आती हूँ।

    स्रोत :
    • रचनाकार : ऋषिता सिंह
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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