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मैं

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मोहन आलोक

और अधिकमोहन आलोक

    कई लोग

    पाँवों से अपंग पैदा होते हैं

    कई कानों से बहरे,

    ज़ुबान से गूँगे

    तो कई आँखों से अंधे पैदा होते हैं

    अस्वस्थ पैदा होते हैं जन्म से कई लोग

    और अपने रोग को सेते-सहेजते

    इस अनचाही पीड़ा को ढोते

    काट देते हैं पूरी उम्र

    दाट लेते हैं मन मसोस

    अपनी आँखों से झरता अफ़सोस

    दोष किसी को नहीं देते इस अभिशाप का

    पिछले जन्मों के पाप का फल जान लेते है!

    भोगना मौत ज्यों अटल, सिर झुका मान लेते हैं!!

    जी लेते हैं वे लोग

    क्योंकि उनके पास यह आरोपण काट लेने के

    कारण होते हैं

    हाथ, पाँव, आँख, कान, जीभ जैसी

    मालिक की दी हुई नियामतों के भीतर से

    एक को छोड़ बाकी सब-कुछ

    मन में दबा लेने के वाजिब कारण होते हैं।

    पर मैं क्या करूँ

    आपका चहेता कवि

    जो पाँवों से अपंग

    कानों से बहरा

    ज़ुबान से गूँगा

    और साथ ही

    आँखों से अंधा पैदा हुआ—

    निरोग पैदा हुआ भले ही काया से,

    पर मन से तो रुग्ण ही पैदा हुआ।

    पांगळो हूँ,

    मैं

    मेरे पेट के नीचे

    पाँवों का एक लुंज है

    जो सिर्फ़ होने का भ्रम पैदा करता है।

    दिखने में भले ही मेरे कान हैं

    पर बेजान हैं

    किसी सकपकाए ठूँठ के भीतर

    चील के कोटर सरीखे।

    पर ज़ुबान नहीं

    ज़ुबान की जगह मांस का एक लोथड़ा है

    जिसे मैं अगर

    कभी पलटने की कोशिश करूँ

    तो फकत एक ही आवाज़ निकलती है

    गूं ऽऽऽ गूं ऽऽऽ

    मेरे पास आँखें नहीं

    आँखों की जगह दो गड्ढे हैं

    जिनके भीतर काँच के दो कंचे फिट हैं

    साँस आती है

    लुहार की धोंकनी की मानिन्द

    फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि वह मुर्दा है

    और मेरी देह

    जीवित मांस का एक लिजलिजा पिंड है।

    अगर नहीं होता पंगु

    होते मेरे पेट के नीचे भी पाँव

    तो आप क्या जानें

    कि ये ठग

    जो कभी मुझे सरकार बनकर

    कभी परंपरा बनकर

    कभी रिवाज बनकर लूटते हैं

    पीते हैं मेरे रक्त की एक-एक बूँद

    मैं इनके ज़ोर की ठोकर लगा देता

    धूल में मिला देता

    इनके नापाक इरादों के षड्यंत्र

    तार-तार कर देता

    इनका तंत्र

    इनकी तिकड़म

    इनके मंत्र उच्चारित करने के ढंग।

    एक धक्के से नहीं तोड़ डालता

    इन आदमखोर भेड़ियों के केंचुल

    मिर्च-सा मसल देता

    इनके नाख़ून

    कि ये मनुष्य का भक्ष्य लेने से

    आजिज़ जाते

    या फिर हमीं को खा जाते

    मैं

    इस भेड़िया गिरोह के बीच

    बँधे हुए मेमने सा हूँ

    मैं

    कि हमें अपने सामने खड़े दुश्मन के

    हिलते हुए कलेजे का पता है

    फिर भी वार से चूक रहा हूँ।

    मैं तो इस रसे-बसे जगत के

    निर्जन जंगल

    और इस सूरज के घुप्प अँधेरे पर

    होते बलात्कार की चीख

    मेरे कानों में

    अवश्य ही गूँजती

    सूझती कोई नई युक्ति

    मारता कोई तीर

    तानकर दशरथ की तरह

    बींध देता 'श्रवण' के स्थान पर

    कोई 'रावण'।

    हूँ,

    बहरा हूँ मैं—

    कि मुझे बमों के धमाके सुनाई पड़ते

    अनमोल बच्चों की किलकारियाँ

    युद्धों की आग में जलते

    मनुष्य की चीख

    अबला की पुकार

    'खुर्रमशहर'

    'बसरा' के बीच जलती

    इस आग में

    झुलसते किसी शिशु को

    अगर बचा नहीं सकता था

    तो जल तो सकता ही था साथ।

    मैं गूँगा हूँ

    किसी अनगढ़ पत्थर की भाँति

    कि कोरे काग़ज़ पर

    बैठा आड़ी-तिरछी लकीरे बनाता हूँ

    देता हूँ

    लोगों को झूठे दिलासे

    और आँकड़ों के सहारे

    मन की बात बनाता हूँ।

    मेरे मुँह में ज़ुबान नहीं है

    अन्यथा मैं सिंह की भाँति दहाड़ता कोई कविता

    और फाड़ डालता लोगों के

    कानों के पर्दे

    अपने बड़बोलेपन से

    गुंजायमान कर देता सारा जंगल

    कि मेरी कविता

    कि मेरी कविता कलम बन जाती

    और लोगों के हृदय में

    शब्द-शब्द रच जाती।

    मैं अंधा हूँ

    निरंध

    कि होती आँखें

    एक उजली रोशनी की तलाश में

    कभी परंपरा की लाठी पकड़

    पाँव-पाँव अटकता

    तो कभी इतिहास का कंधा थामकर

    क़दम-क़दम गिरता फिरूँ।

    मैं अंधा हूँ आजन्म

    मुझे पाँवों पर झलकती दिखती है

    पहाड़ पर जलती

    मैं अंधा हूँ

    अधीन कि

    मुझे राह दिखती है

    वनराय।

    स्रोत :
    • पुस्तक : आधुनिक भारतीय कविता संचयन राजस्थानी (1950-2010) (पृष्ठ 67)
    • संपादक : नंद भारद्वाज
    • रचनाकार : मोहन आलोक
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी
    • संस्करण : 2012
    हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों का व्यापक शब्दकोश : हिन्दवी डिक्शनरी

    हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों का व्यापक शब्दकोश : हिन्दवी डिक्शनरी

    ‘हिन्दवी डिक्शनरी’ हिंदी और हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों के शब्दों का व्यापक संग्रह है। इसमें अंगिका, अवधी, कन्नौजी, कुमाउँनी, गढ़वाली, बघेली, बज्जिका, बुंदेली, ब्रज, भोजपुरी, मगही, मैथिली और मालवी शामिल हैं। इस शब्दकोश में शब्दों के विस्तृत अर्थ, पर्यायवाची, विलोम, कहावतें और मुहावरे उपलब्ध हैं।

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