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माँ की भूख का व्याकरण

maan ki bhookh ka vyakran

ऐश्वर्या तिवारी

ऐश्वर्या तिवारी

माँ की भूख का व्याकरण

ऐश्वर्या तिवारी

और अधिकऐश्वर्या तिवारी

    माँ की भूख को रोटी की गोलाई में नहीं नापा जा सकता,

    वह तो एक ऐसी अग्नि है

    जो देह के उदर में नहीं,

    गृह के आकाश में जलती रहती है।

    उसके लिए अन्न का दाना

    मात्र अन्न नहीं,

    बच्चों के भविष्य की लिपि है

    हर निवाला मानो किसी अदृश्य पन्ने पर

    लिखा गया एक और शब्द हो

    जो उन्हें उससे आगे ले जाए

    जहाँ तक वह स्वयं कभी नहीं पहुँच सकी।

    बच्चों के बस्तों में रखे डिब्बे

    उसके लिए सिर्फ़ टिफ़िन नहीं,

    छोटे–छोटे समझौते हैं

    वह अपने हिस्से की थकान

    किसी कोने में रख देती है

    ताकि उनकी दौड़ में

    उसकी कमी की साँस शामिल हो।

    पिता की नाड़ियों में बहता रक्त

    उसके लिए केवल शरीर की गति नहीं,

    घर की संहिता है।

    वह नमक घटाती है,

    हँसी बढ़ाती है,

    दवाइयों की शीशियों के बीच

    अपनी चुप्पी रख देती है

    ताकि बीमारी का व्याकरण

    पूरे घर की भाषा बन जाए।

    आँगन के गमलों में

    जो पानी वह डालती है,

    वह जल नहीं,

    किसी प्राचीन स्तुति की पुनरावृत्ति है

    बीजों के लिए यह

    किसी ऋचा की तरह है,

    जिसमें वह पृथ्वी को

    अपने भीतर की ममता का

    प्रतिरूप बना कर सौंप देती है।

    छत पर बिखरा हुआ दाना

    उसके हाथ से गिरा हुआ चाव नहीं,

    एक सूक्ष्म संधि है

    मनुष्य और आकाश के बीच

    चिड़ियाँ जब उसे चुनती हैं,

    तो केवल पेट नहीं भरतीं,

    उसके भीतर जमी

    अपराधबोध की बर्फ़ का

    थोड़ा–थोड़ा पिघलना भी साथ ले जाती हैं।

    रात को जब सब सो जाते हैं,

    और घड़ी की सुइयाँ भी

    थकान से धीमी पड़ जाती हैं,

    वह रसोई की चौखट पर टिककर

    दिन के व्याकरण को उलटती–पलटती है

    कहाँ स्वर अधिक थे,

    कहाँ व्यंजन घुट गए,

    किस जगह बच्चे की हँसी का विरामचिह्न

    बहुत जल्दी लगा दिया गया।

    वह अपने लिए रखी

    ठंडी हो चुकी रोटी को देखती है,

    और अनायास मुस्कुरा देती है

    मानो किसी ने पूछा हो,

    “तुम्हें किस चीज़ की भूख है?”

    वह कहती है, “कुछ नहीं…”

    पर उसके इस “कुछ नहीं” के भीतर

    जितनी आकांक्षाएँ,

    जितनी प्रार्थनाएँ,

    जितनी अधूरी यात्राएँ छिपी हैं,

    वे किसी भी भरी हुई थाली से

    कहीं अधिक भारी हैं।

    माँ की भूख, भूख नहीं,

    एक निरंतर विस्तारमान वृत्त है

    जिसके केंद्र से वह स्वयं

    धीरे–धीरे धुँधली होती जाती है,

    और उसके स्थान पर

    बच्चे, पिता, पौधे, चिड़ियाँ,

    यहाँ तक कि दीवारों पर टँगे

    पुराने कैलेंडर तक

    परिधि बन कर उभर आते हैं।

    समय की वैश्विक घड़ी में

    जब संसार भूख की परिभाषाएँ गढ़ता है

    बाज़ार, युद्ध, और अधूरे सपनों की भाषा में

    तब कहीं सबसे भीतर

    एक माँ अपनी छोटी-सी रसोई में

    भूख का एक और रूप लिखती है;

    जिसमें अपना नाम

    सर्वनाम की तरह ग़ायब रहता है,

    पर जिसकी उपस्थिति के बिना

    किसी भी घर का वाक्य

    पूरा नहीं हो पाता।

    स्रोत :
    • रचनाकार : ऐश्वर्या तिवारी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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