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लोकशाहों से

lokshahon se

उदय प्रताप सिंह

उदय प्रताप सिंह

लोकशाहों से

उदय प्रताप सिंह

और अधिकउदय प्रताप सिंह

    कोई ख़ुशबू, न कोई फूल, न कोई रौनक़

    उस पर काँटों जहालत नहीं देखी जाती

    हमने खोली थीं इसी बाग़ में अपनी आँखें

    हमसे इस बाग़ की हालत नहीं देखी जाती

    बुलबुलें ख़ुश थीं उम्मीदों के तराने गाये;

    कि लेकर पतझड़ से बहारों को चमन सौंप दिया

    अब तो मासूम गुलाबों की ये घायल ख़ुशबू

    शीष धुनती है कि ख़ारों को चमन सौंप दिया

    रात बस रात जो होती तो कोई बात न थी

    उसका आकार मगर दूना नजर आता है

    कितने चमकीले सितारे थे, कहाँ डूब गये

    सारा आकाश बहुत सूना नज़र आता है

    वही आकाश, वही धरती, है जलवायु वही

    देशभक्तों के कलेजे में मगर आग नहीं

    इन फ़रिश्तों को नुमाइश में न कोई चेहरा

    जिसके दामन में गुनाहों का लगा दाग़ नहीं।

    बहते दरिया को शिकायत है कि नाविक बनकर

    तुमने कश्ती को ही तूफ़ान बना डाला है

    ऊँचे आदर्श सरेआम यूँ नीलाम किए

    जैसे जनतंत्र को दूकान बना डाला है।

    खारे आँसू से मिला दूध पिलाया माँ ने

    भीगी होती है पसीने में जवानी इनकी

    ज़िंदगी इनको विमाता की तरह रखती है

    प्यार से मौत ही सुनती है कहानी इनकी।

    कवि की आवाज़ बग़ावत पे उतर आई है

    दल के दलदल से हमें कोई सरोकार नहीं

    तुमने इस देश की तस्वीर बिगाड़ी ऐसे

    जैसे इस देश की मिट्टी से तुम्हें प्यार नहीं

    तुमने क्या काम किया ऐसे अभागों के लिए

    जिनकी मेहनत से तुम्हें ताज मिला, तख़्त मिला

    उनके सपनों के जनाज़ों में तो शामिल होते

    तुमको शतरंज की चालों से नहीं वक़्त मिला

    तुमने देखे ही नहीं भूख से मरते इन्सां

    सिलसिले मौत के जो बंद नहीं होते हैं

    इनके पैबंद लगे चिथड़े ये गवाही देते;

    कि इनके किरदार में पैबंद नहीं होते हैं

    जिस जगह बूँद पसीने की गिरा देते हैं

    ठौर सोने के उसी ठौर निकल आते हैं

    किंतु बलिहारी व्यवस्था की है जिसमें बहुधा

    मुँह में बच्चों के दिए कौर निकल आते हैं

    तुमने गाँधी के उसूलों की क़सम खा खाकर

    अपने नापाक इरादों की वकालत की है

    पिछले कुछ आम चुनावों के नतीजों की क़सम

    अपने राजाओं से रैयत ने बग़ावत की है

    पूछता हूँ मैं बता दो, ऐ सियासत वालो!

    आदमी अपने ही ईमान का दुश्मन क्यों है

    एक ईश्वर है पिता उस का सगी दो बहनें

    आरती और नमाज़ों में ये अनबन क्यों है

    इनकी आदत में नहीं ख़ून से कपड़े रँगना

    कोई मजबूरी रही होगी अक़ीदा तो नहीं

    अपने दामन में जरा झाँक कर तुम ही कह दो

    अपने मतलब के लिए तुमने ख़रीदा तो नहीं

    बात करने को उसूलों की सभी करते हैं

    वोट लेने का ये नाटक है इसे ख़त्म करो

    ऐसी आज़ादी, ग़ुलामी से बहुत बदतर है

    ये वो चिंतन है, जो घातक है, इसे ख़त्म करो

    वर्ना अंजाम वही होगा, जो औरों का हुआ

    कुर्सी तो कुर्सी, निगाहों से उतर जाओगे

    मौत जब आएगी तब आएगी तुम्हारी ख़ातिर

    वक़्त से पहले, बहुत पहले ही मर जाओगे।

    स्रोत :
    • रचनाकार : उदय प्रताप सिंह
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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