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लरिकउन ए० मे० पास किहिनि

larikun e० mae० paas kihini

बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'

बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'

लरिकउन ए० मे० पास किहिनि

बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'

और अधिकबलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'

    सबि पट्टी बिकी असट्टय मा,

    लरिकउन ए० मे० पास किहिनि।

    पुरिखन का पानी खुबयि मिला,

    लरिकउनू ए० मे० पास किहिनि॥

    अल्ला-बल्ला सब बेंचि-खोंचि,

    दुइ सउ का मनिया-अडरु किहिनि।

    उहु उड़िगा चाहयि पानी मा,

    लरिकउन ए० मे० पास किहिनि॥

    हम मरति-खपति द्याखयि दउर्यन,

    उयि मिन्त्र मण्डली मा नाचयिं।

    दीदा-दरसनउ कयि पायन,

    लरिकउन ए० मे० पास किहिनि॥

    महतारी विलखयि द्याखयि का,

    बिल्लायि म्यहरिया ब्वालयि का।

    उयि परे कलपु-घर पाले मा,

    लरिकउनू ए० मे० पास किहिनि॥

    कालरु, नकटाई, सूटु, हैटु,

    बंगला पर पहुँचे सजे-बजे।

    नउकरी पायिनि पाँचउ की,

    लरिकउनू ए० मे० पास किहिनि॥

    अरजी लिक्खिनि अँगरेजी मा

    घातयिं पूछयिं चपरासिन ते।

    धिरकालु “पढ़ीस” पढ़ीसी का,

    लरिकउनू ए० मे० पास किहिनि॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : पढ़ीस ग्रंथावली (पृष्ठ 71)
    • संपादक : डॉ. रामविलास शर्मा, युक्तिभद्र दीक्षित
    • रचनाकार : बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'
    • प्रकाशन : उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ
    • संस्करण : 1998

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