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कुएँ की जगत पर प्यास की जुगत

kuen ki jagat par pyaas ki jugat

सोनू यशराज

सोनू यशराज

कुएँ की जगत पर प्यास की जुगत

सोनू यशराज

और अधिकसोनू यशराज

    उनके पास खाना पका और खा लेने जितने बर्तन थे

    अतिथि के आने पर पड़ोसी के बर्तन भी घर जाते!

    जब उनके घर की छत पर बूंदें राज करती

    तब बारिशें भी घर को मेज़बानी के लिए उकसाती!

    बीज-खाद-पानी-सुरक्षा

    हर साल कोई दो ही उनके खेत के भाग्य में रहे

    वे अँधेरी रात दौड़ते और भोर तक

    खेत की मेड़ बनाते

    तब उनके घर पर स्त्रियाँ

    दहलीज़ के अंदर-बाहर होती रहती!

    वे सूत कातते थे और देखते रहते

    अपने बच्चों को सिर झुकाए बड़ा होते

    उनके सूत उलझ जाते थे अक्सर लपेटते-लपेटते

    भविष्य की तह को खोजते!

    सुलझे खिले गट्ठरों से मिल मालिक

    छाँट लेता था अपना असल

    और वे अलग –थलग पड़े गट्ठरों के साथ

    सुलझाते थे अपना जीवन!

    अपने से बड़ी उम्र वाले से ब्याही गई उनकी बेटियाँ

    चली जाती थी ख़ुशी से ससुराल

    और कई सावन

    प्रतीक्षा करती रहती उनके बुलावे की!

    उनके आदर्श गाँव में सरपंच की तत्परता से

    खँड अधिकारी अनुदान राशि बढ़ाने हेतु

    चिट्ठी लिखते सरकार को

    चूँकि चलती रहनी चाहिए

    कुएँ की जगत पर प्यास की जुगत!!

    स्रोत :
    • रचनाकार : सोनू यशराज
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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