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कुछ है जो रह जाता है

kuch hai jo rah jata hai

ममता धवन

ममता धवन

कुछ है जो रह जाता है

ममता धवन

और अधिकममता धवन

    वो फरवरी थी या

    मार्च था

    हवा में नमी थी या

    मौसम शुष्क था

    नई कोंपले फूटीं थीं या

    पतझड़ था

    गरमी आने को थी या

    सरदी की रवानगी थी

    बहार पीली सरसों की थी

    या खेतों में रोपा बाजरा था

    साँझ की गोधूलि थी या

    मंदिर में जलता दीया था

    वो रात अँगीठी जलाने की थी या

    छत पर पसरा सपना था

    पत्तों पर बिखरी ओस थी या

    चारों ओर फैला कोहरा था

    कोयल की कूक थी या

    दूर तक फैला सन्नाटा था

    आज कुछ भी याद नहीं

    बस इतना याद है

    कि जब हम मिले थे

    तब बरसात थी

    और हमारी विदाई का गीत भी

    बरसात ने ही गुनगुनाया॥

    स्रोत :
    • रचनाकार : ममता धवन
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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