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कुछ भी नहीं बचता पागलपन के सिवाए

kuch bhi nahin bachta pagalpan ke sivaye

अनुवाद : सरिता शर्मा

अदूनिस

अदूनिस

कुछ भी नहीं बचता पागलपन के सिवाए

अदूनिस

और अधिकअदूनिस

    मैं घर की खिड़कियों पर अब झलक पाता हूँ

    अनिद्र पत्थरों के बीच की नींद से दूर,

    चुड़ैल के सिखाए बच्चे की तरह

    कि समुद्र में रहती है एक औरत

    अपने इतिहास को अँगूठी में समेटे हुए

    और वह तब प्रकट होगी

    जब चिमनी में लपटें बुझने लगेंगी...

    और मैंने इतिहास को देखा स्याह झंडे में

    जंगल की तरह आगे बढ़ते हुए

    मैंने कोई इतिहास नहीं लिखा

    मैं, क्रांति की आग की लालसा में जीता हूँ

    उनके सर्जनात्मक जहर के जादू में।

    मेरी मातृभूमि इस चिनगारी के सिवाए कुछ भी नहीं है,

    अनंत समय के अँधेरे में यह रोशनी...

    स्रोत :
    • पुस्तक : विश्व की श्रेष्ठ कविताएँ (पृष्ठ 101)
    • रचनाकार : अदूनिस
    • प्रकाशन : इंडिया टेलिंग
    • संस्करण : 2020

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