कोई नहीं बता पाता
koi nahin bata pata
कोई नहीं बता पाता मुझे कहाँ है वह परदेस
और क्यों तुम्हारी नाव को, प्रिय, उस चट्टान के पास से
गुज़रना पड़ा।
सब तुम बता देते, पर तुम्हारा गला अब नहीं बोल पाएगा।
मुझे भी पता नहीं कि उस सागर की मछलियाँ पेटू हैं या नहीं
और क्या उन्होंने तुम्हारी आँखें काटी, मेरी प्रियतम आँखें।
बिना उनके मैं नेत्रहीन-सी हूँ ख़ूब उजले दिनों में भी।
कोई मुझे बता नहीं पाता कुछ।
हमें पता भी क्या उन सात घरों का?
घुग्घू ताकता है बहरे पत्थर को
भेड़िया-सा सागर हूकता है पुरानी दीवार के नीचे।
बच्चे बस तुम्हारी ही बात करते, उपहारों की प्रतीक्षा करते
मुझसे पूछते, क्यों रोती हूँ-और मैं उन्हें बता नहीं पाती।
कैसे कहूँ उनसे, कब तुम्हारी राह देखें?
मुश्किल से कह पाती हूँ : लंबा है सफ़र बच्चो, जिस पर
बहुत लंबा है सफ़र। सोते रहो!
तुम्हारे पिता गए हैं।
वे सोचते हैं कि विश्वभ्रमण का रास्ता इतना लंबा होता है।
आह, काश यह विश्वभ्रमण होता! तुम लौट ही आते किसी
भोर में शरद से पहले।
पर यह तो भ्रमण है विश्व से, जिसकी वापसी नहीं।
सब तुम्हारा सामान मैंने रख दिया है
पुराने सूटकेस में दुछत्ती पर,
कि समय से पूर्व ही न रोकर बहा दूँ जीवन,
इन बच्चों को भी तो खड़ा करना है।
दोनों ही नाव के स्वप्न देखते हैं।
ओ मेरे प्रियतम! हाथ डुबाती हूँ सागर में
जब रात सबसे गहरी होती है,
सागर की घास निकालकर माथे पर लगाती हूँ
पागलपन का दौरा, निराशा, घास, तुम्हारे ठण्डे केस।
और तुम लौटोगे नहीं...
चली जाऊँगी शहर से। शायद कोई बता दे
कहाँ है वह परदेस,
परदेस! परदेस!
क्या तुम्हारा सागर नीला है?
- पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 106)
- संपादक : श्यौराजसिंह जैन
- रचनाकार : यूरे फ्रनीचैविच-प्लोचार
- प्रकाशन : बाहरी पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
- संस्करण : 1978
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