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किताब

kitab

सोनू यशराज

और अधिकसोनू यशराज

    मेरे हाथ में किताब है

    जो पढ़ रही है मेरा मन

    जैसे कोई पढ़ता है

    आँखों को बिना बोले बिना तोले

    जब मैं मुस्कुराते हुए पढ़ रही हूँ किताब

    ठीक उसी वक्त एक लड़की के भविष्य के बारे में

    उसके पिता ने सुना दिया है

    उसे किताबों से दूर ले जाता हुआ एक फैसला

    कहीं किसी शहर में एक पिता ने बेच दी हैं

    अपने लड़के की प्रिय किताबें

    अपनी शाम का इंतज़ाम करने के लिए

    एक सौतेली माँ ने रख दी हैं परछत्ती पर किताबें

    और सो रही देर तक

    सुबह के पानी की फ़िक्र किए बिना

    एक परिवार ने बनाने शुरू कर दिए हैं,

    किताबों से थोक के भाव में लिफ़ाफ़े

    परदेस गए अपने पति के प्रिय लेखक की

    कुछ किताबें रद्दी में दी हैं

    एक पतिव्रता स्त्री ने अभी-अभी

    मेरे अपने गाँव में

    चूल्हे को समर्पित की हैं

    काकी ने कुछ किताबें

    मेरे आस-पड़ोस की दुनिया में

    किताबें कम होती जा रहीं हैं

    और मुस्कुराहटें भी

    किताबें होती हैं एक ज़िंदा शै

    देखा नहीं कैसे फड़फड़ातें हैं पन्नें

    झपट्टा मारते हैं बाज की तरह

    शब्द तुम्हारी आँखों में, और कौंधतें हैं मन में विचार

    किताब साथ होने के मायने जानता है

    कल साइकिल चलाते हुए पैर तुड़वा बैठा एक लड़का

    और तीन महीने बाद काम पर निकले उसके अभिभावक

    बगल में रहने वाला उसका खिलंदड़ा दोस्त , स्मार्ट टीवी और फ़ोन

    ये सब उस अकेले लड़के का दुःख नही उठा पाएँगे,

    तब वो उठाएगा किताबें

    बचपन की एलबम वाली किताबों से

    अब तक की साइंस फ़िक्शन वाली किताबें

    अजनबियों से भी बदलेगा खिड़की से किताबें

    स्कूल छुड़ा दी गई महावर रची लड़की

    नुक्कड़ की दुकान से पढ़ेगी

    कृष्णा सोबती, ममता कालिया की कहानियों की किताबें

    वो पढ़ेगी दीवार फांदना मुश्किल है तो क्यों

    खिड़की पर पाँव धर लिए जाएं

    किताब के बने लिफ़ाफ़ों को पढ़ता

    हाथ फ़िराता दसवीं फेल लड़का

    पिता की परचून की दुकान पर बैठा

    अब इनसे प्रेम कर बैठेगा

    घर से भागा लड़का

    स्टेशन पर भेलपुरी रखे काग़ज़ में

    तलाशेगा अपनी किताबें

    उधर उसकी माँ

    लेखक सत्यनारायण की डायरी पढ़

    जानना चाहेगी उसका मन

    और इधर रैक में रखी

    उदास किताबों को देख

    सोच रहें होंगे नगर के तमाम लाइब्रेरियन

    महामारी में देनी थी चार किताबें ज़्यादा

    मेरे हाथ में अब भी किताब है

    और मैं मुस्करा रही हूँ

    स्रोत :
    • रचनाकार : सोनू यशराज
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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