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खुदाई

khudai

अनुवाद : सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज

सीमस हीनी

सीमस हीनी

खुदाई

सीमस हीनी

और अधिकसीमस हीनी

    तनी हुई बंदूक़ की मानिंद

    मेरे अँगूठे और उँगली के बीच तत्पर—तैनात

    ये नन्ही फ़ौलादी क़लम

    पथरीली ज़मीन को चीरते कुदाल की

    खड़खड़ाती आवाज़

    खिड़की से साफ़ सुनाई देती है

    देखता हूँ उस तरफ़ तो

    खुदाई में लगे हैं मेरे बाप

    आलू की क्यारियों में तने हुए उनके पुट्ठे

    झुकते ही चले गए—नीचे और नीचे

    जहाँ लगे थे वह खुदाई में।

    आलू खोदते खुरपे से

    निकलते चले आए बारी-बारी

    एक पर एक

    एक लय में बीसों साल

    घुटनों के पीछे कुदाल की बेंट

    टेक लगाए भिड़ा था पूरे दम-ख़म से

    खुरदुरे बूट जमे थे पूरी ताक़त से अपनी जगह

    कुदाल की चमकती फाल से

    अंदर जड़ तक मारते

    उखाड़ डाले उन्होंने सब के सब बड़े लंबे डंठल

    फैलाते नए आलू की फ़सल चारों ओर

    जिन्हें उठा कर अपने हाथों में

    महसूस करते थे हम

    उनकी नर्म ठंडी शक्लें

    और सख़्त आकार

    क़सम से क्या ही कमाल

    चलाते थे वह कुदाल

    ठीक अपने बाप की तरह

    इस लिसड़ाते पंकिल इलाक़े में,

    पूरे जवार में, किसी और किसान से

    ज़्यादा खुदाई कर डालते थे

    मेरे बाबा एक दिन में

    एक बार मैं उनके लिए

    काग़ज़ से जैसे-तैसे फँसाए

    ढीले-ढाले ढक्कन से बंद

    एक बोतल में

    दूध लेकर गया

    घूँट भरने भर को वह सीधे हुए

    और फिर जुट गए खेतों में

    एक-एक परत काटते-छाँटते-उलीचते

    कंधों के ऊपर से

    पीछे को फेंकते

    ही चले गए,

    एक ही साँस में

    जब तक खोज ही डाली

    खेती के लिए मनमुआफ़िक़ मिट्टी

    अब मेरे माथे में उग आए

    ताज़ी पक्की चोट लिए

    कुदाल की धार लगे

    सजीव जड़ों से

    चेथराए आलुओं की कच्ची गंध

    घुसती है नथुनों में

    फचफचाते पतवार,

    चफनाए डाढ़ियों-पत्तियों की चपर चपर

    सुन पड़ती है।

    लेकिन नहीं है मेरे पास

    उनके रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए

    कोई कुदाल या खुरपा

    बस ये नन्ही फ़ौलादी क़लम

    टिका है मेरे अँगूठे और उँगली के दरमियान

    करूँगा मैं अब खुदाई इसी से।

    स्रोत :
    • पुस्तक : सदानीरा पत्रिका
    • संपादक : अविनाश मिश्र
    • रचनाकार : सीमस हीनी

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