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कविता

kavita

स्मृति झा

स्मृति झा

कविता

स्मृति झा

और अधिकस्मृति झा

    कविता मेरी,

    लोग जब-जब तुम्हें पढ़ेंगे

    कोई विचार तलाशेंगे

    वे कहेंगे वक़्त की यही ज़रूरत है

    तुम अपनी मासूमियत बरक़रार रखना

    मैं पूरी कोशिश करूँगी तुम्हें छोड़ूँ

    तुम्हें छेड़ूँ

    ही बदलूँ तुम्हारे प्रवाह को

    तुम बिखर जाना पृथ्वी के प्रत्येक कोने में

    सहलाना उसके घाव

    लेकिन ध्यान देना

    कहीं कोई प्यास मर जाए

    अपना उद्‌गम और अंत

    तुम ख़ुद निर्धारित करना

    लेकिन कभी किसी समंदर से जाकर मत मिलना

    वे कहेंगे तुम प्रेम हो

    लेकिन तुम याद रखना

    तुम प्रेम नहीं आग हो

    जिसके सिरहाने बैठकर

    व्यक्ति के सीने का पत्थर पिघलता जाता है

    उसका प्रेम उसकी रगों में उतरता है

    एक नई रचना बनकर

    तुम मत बनना कभी किसी की प्रेयसी

    वे तुम्हारे सबसे कोमल अंगों को निहारेंगे

    एक-एक शब्द खोलकर करेंगे तुम्हें निर्वस्त्र

    तुम्हारे गठन को जाचेंगे

    याद रहे!

    उन्होंने विमर्शों को पढ़ रखा है

    उन्हें पता है दबाने से तुम सतर्क हो जाओगी

    इसलिए तुम्हें सहलाकर मरोड़ देंगे

    और अगर वे सफल हो पाए

    तो कह देंगे तुम मुकम्मल नहीं हो!

    स्रोत :
    • रचनाकार : स्मृति झा
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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