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कान्हा की बँसुरिया

kanha ki bansuriya

सत्यधर शुक्ल

सत्यधर शुक्ल

कान्हा की बँसुरिया

सत्यधर शुक्ल

और अधिकसत्यधर शुक्ल

    (लहचारी)

    बाजी कान्हा की बँसुरिया आधी राति,

    कर्यजवा मा हूक उठी।

    थोरी सिसकि-सिसकि के बाजी,

    थोरी कसकि-कसकि के बाजी,

    मीठी रागिनी पे तिरिया लुटि जाति,

    कर्रजवा मा हूक उठी।

    सनन-सनन ड्बालै पुरुबैया

    घिरा सघन अँधियारा

    दुनिया याक आस मा बाँधे

    जुरा साँस का ड्वारा।

    कारी घटा मा बीजुरिया अठिलाति,

    कर्रजवा मा हूक उठी।

    पौढ़ी तीर सगी महतारी,

    बप्पा भरैं खखारी

    पिसोपेंच मा परिउँ करौं का

    मुरली रही पुकारी।

    जैसे जल का मछरिया तलफाति,

    कर्रजवा मा हूक उठी।

    जैसे-तैसे औसरु पायउँ,

    छुटे मोह के बंधन,

    चलिउँ सिहाइ उमंगति उछरति

    पगा प्रेम मा तन मन।

    सौ सौ पतरी कमरिया बल खाति,

    कर्यजवा मा हूक उठी।

    भादौं की करिया अम्बाउस

    सूझि परै डगरिया

    कुंजन खोजि थकिउँ ना पाइउँ,

    हिरदै बसा सँवरिया

    फ्वारै आँसू की नजरिया बरसाति,

    कर्यजवा मा हूक उठी।

    जागे भाग्य, मिले मनमोहन

    अतुल रूप पर रीझिउँ,

    ठगिउँ, बिकिउँ तिरछी चितवनि पर

    देखि मुरलिया खीझिउँ

    भोली छवि पै बावरिया सब भाँति,

    करयजवा मा हूक उठी।

    बड़े प्रेम ते बढ़ि उन आगे

    मोकों कण्ठ लगायउ;

    हिया मिले, आनंदु छाइगा

    पापी भरमु नसायउ।

    मुला मन की गुजरिया खिसियाति,

    करयजवा मा हूक उठी।

    बाजी कान्हा की बँसुरिया आधी राति

    करयजवा मा हुक उठी।

    अगस्त 1960 ई.

    स्रोत :
    • पुस्तक : अरघान (पृष्ठ 62)
    • रचनाकार : सत्यधर शुक्ल
    • प्रकाशन : पं. वंशीधर शुक्ल स्मारक एवं साहित्य प्रकाशन समिति, मन्यौरा, लखीमपुर खीरी
    • संस्करण : 2021

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