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कने सुनि लेब

kane suni leb

राज

राज

कने सुनि लेब

राज

और अधिकराज

    हे यौ बटोही! कनी सुनि लेब।

    कनी सुनि लेब एगो एहन गामक कथा

    जत' अधिकतर लोकक लेल

    शिक्षा आइयो चन्द्र लोकक यात्रा सन दुर्गम बनले छै

    जत' आइयो बेसी लोक एहने छै

    जकर औंठा कखन लागनि पर स' हेंठ भ'

    कजरौटी पर पड़ि जाइ छै

    तकर कोनो ठेकान नै

    अहूँ अखियासैत हेबै

    जे, अहाँ गामक कोनो ठीठर

    किए भरना लीख' जाइ छै वसंती चेहरा नेने

    अपन गिरहतक संग कबाला लीखि घुमि अबै छै

    बुझै छै तहिए

    जहिया गिरहतक रूखि ओकरा ले

    एकाएक कड़गर भ' जाइ छै

    अपन आंखि मोनमे हेमंत नेने

    कोनो विराटनगर आकि जोगबोनी ध' लेबा लेल

    बेबस भ' जाइए

    किए कोनो कंटीर

    मैयाक दाग जेकाँ

    महाजनी बहीक मूंह नै भरि पबैए।

    सत्ते! आन्हर आकि अन्हरियाक यात्रा

    केहन दुर्गम होइ छै

    हे यौ! अहूँक आँखि पर नचैत हैत

    कतेको एहन चेहरा जे काल्हि तरीक

    युवराजी उल्लासमे

    अलमातल रहै छलै

    जकर ठोर पर हरदम थिरकै छलै 'वसंती बहार'

    रातियो कोनो सुखद सपनामे गाँथल रहै छलै

    फेर देखने हेबै ओही चेहरा सबके

    गीत नै अक्कत तीत नीम बोन बनल

    जे आड़ुर इसकूलोक 'डेस्क' पर तबला जेकाँ

    गुरकैत छलै।

    तेकरा पेट पर पिछरैत देखैत हेबै

    राज-पथ स' हेंठ

    कोनो महानगरक फुट-पाथ पर गुड़कैत देखैत हेबै

    हे यौ बटोही! एना किए होइ छै।

    कि चटिया के मोन धरती-अकास-नदी

    पहाड़क भूगोल स' उचैट

    भूखक भूगोल नपबा धरि सीमित रहि जाइ छै

    पोथी स' बढ़ि के रोटी बुझा जाइ पड़ै छै

    किए ककरो जिनगीक नाग-पचीसीमे

    खाली साँपे

    ककरो सीढ़ी भेटै छै

    हे यौ बटोही! ओना हम जनै छी

    अहाँक हतासी घृणाक ओजह!

    मुदा अन्हार स' उबिया इजोतक संधान छोड़ि

    अन्हारेमे जुनि हेराउ|

    हे यौ बटोही! अहाँ घुरि जाउ

    अहाँ घुरि जाउ!

    स्रोत :
    • पुस्तक : ऐ अकाबोन मे (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 23)
    • रचनाकार : राज
    • प्रकाशन : नवारम्भ, पटना
    • संस्करण : 2011

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